अमेरिका-यूरोप के स्कूलों से भारत के स्कूलों की पढाई में क्या है अंतर, किस सिस्टम से होता है बच्चों का बेहतर विकास, जानें
करिअर की शुरुआत सबसे पहले होती है स्कूलों से। और हर देश का सिस्टम थोड़ा अलग होता है। अनेक लोग इस बात पर विचार करते रहते हैं कि अमेरिका और यूरोप के स्कूल अलग कैसे होते हैं।
स्टूडेंट सलेक्ट करे सब्जेक्ट
कल्पना कीजिए एक ऐसे एजुकेशन सिस्टम की जहां किसी व्यक्ति को कक्षा दस के बाद विषय चुनने में कोई रिस्ट्रिक्शन न हो। यानी वह जो चाहे अपने पढ़ने के लिए चुन सके, फिर चाहे वह एक्टिंग हो, विज्ञान, इकोनॉमिक्स, आर्ट या स्पोर्ट्स।
उदाहरण के लिए, मुझे बैडमिंटन खेलना पसंद है तो कक्षा 11 में फिजिकल एजुकेशन, फिजिक्स और मैथ्स के साथ बैडमिंटन को भी एक सब्जेक्ट की तरह पढ़ सकूं। और इसमें मास्टर्स या शायद उससे भी आगे की पढ़ने की सुविधाएं हो।
प्रश्न आ रहा होगा कि आर्ट्स जैसे कि म्यूजिक, डांस, या स्पोर्ट्स जैसे कि बैडमिंटन या क्रिकेट में, अकेडमिक तौर पर क्या पढ़ाएंगे और कितना पढ़ाया जा सकता है, यानी केवल हायर सेकेंडरी में या केवल ग्रेजुएशन लेवल तक या पूरा पोस्ट ग्रेजुएट लेवल तक। तो इसका उत्तर है कि जीवन भर केवल 'बैडमिंटन' पर पढ़ाई की जा सकती है।
उदाहरण के लिए बैडमिंटन खेलना सीखने के साथ, बैडमिंटन का अपना इतिहास, विज्ञान और अर्थशास्त्र भी है जिसमें इतना कंटेंट रिसर्च कर बनाया जा सकता है कि पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई के लिए काफी हो।
जरा सोचिए, एक ऐसा बैडमिंटन खिलाड़ी जो न केवल बैडमिंटन की प्रैक्टिस करता है उसके इतिहास, विज्ञान और अर्थशास्त्र से भी परिचित है, बाकियों से अलग नहीं होगा? क्या ऐसे खिलाड़ियों, जिन पर दूसरे सब्जेक्ट्स को पढ़ने का भार नहीं है, भारत की मेडल संख्या को बढ़ा नहीं सकते?
हम सभी जानते हैं कि सभी व्यक्ति टॉप पर नहीं पहुंचते। वे लोग जो बैडमिंटन खेले तो सही लेकिन खेल में कुछ खास नहीं कर पाए वे अपनी पढ़ाई पूरी कर बैडमिंटन के क्षेत्र में ही रोजगार ढूंढ पाएंगे… जैसे कोई कोच बनना पसंद कर सकता है, तो कोई कमेंटेटर या फिर कोई शटल-कॉक और रैकेट बनाने की यूनिट डालना पसंद कर सकता है। फिर स्पोर्ट्स शॉप से लेकर स्पोर्ट्स अकैडमी तक के रास्ते खुले हैं। और तो और बैडमिंटन पढ़ाने वाले लोगों की भी आवश्यकता होगी।
अमेरिका और यूरोप के कई देशों के एजुकेशन सिस्टम्स में समय के साथ विकास हुआ है और आज वे भारत के एजुकेशन सिस्टम से अधिक कुशल, एडवांस और पॉजिटिव रिजल्ट देने वाले साबित हुए हैं।
1) डिफरेंस नं 1 – ब्रिटिश इंपीरियलिज्म की छाया
भारत के एजुकेशन सिस्टम पर ब्रिटिश इंपीरियलिज्म के समय आवश्यक स्किल्स जैसे रट्टा मारकर याद करना, अच्छी हैंडराइटिंग बनाना, मेन्टल कैलकुलेशन आदि पर बहुत जोर है जबकि यूरोप और अमेरिका के स्कुल अब इससे आगे निकल चुके हैं और क्रिटिकल थिंकिंग, प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स, लॉजिक, हाथ से कर के सीखने पर जोर देते हैं। इसका सीधा असर उनके वर्क कल्चर पर आता है।
मुझे वह किस्सा याद आता है जब भारत के बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति ने बेंगलुरू के सबसे अच्छे स्कूल में जाकर यह प्रश्न किया कि ‘मौसम क्यों होते हैं?’ केवल कुछ ही स्टूडेंट्स इसका उत्तर दे पाए। जब उनसे आगे यह पूछा गया कि यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर 23.5° के बजाय अधिक या कम झुकी होती तो उससे क्या फर्क पड़ता तो वे उत्तर देने में असमर्थ थे। जब उन महोदय ने यही प्रश्न जापान में एक स्कूल में किया तो बच्चे ये बता पा रहे थे कि यदि वह एंगल 23.5° से ज्यादा होता तो जापान में साल भर बर्फ जमी रहती।
कहने का अर्थ यह है कि भारत के स्कूलों को अब 'तथ्य' आधारित शिक्षा से बाहर निकल कर कॉन्सेप्ट' आधारित शिक्षा पर फोकस करना होगा। ये न तो सरल है न ही स्वाभाविक।
2) डिफरेंस नं 2 – सभी विषयों का सम्मान
भारतीय स्कूलों में पाठ्यक्रम आम तौर पर मैथ्स, साइंस और लैंग्वेज जैसे शैक्षणिक विषयों पर अधिक केंद्रित होता है। इसके विपरीत, यूरोप और अमेरिका में आर्ट्स, म्यूजिक, फिजिकल एजुकेशन, प्रोफेशनल ट्रेनिंग जैसे विषयों सहित पाठ्यक्रम अधिक विविध होते हैं।
फिर विभिन्न सब्जेक्ट्स लेने वाले स्टूडेंट्स के साथ जुड़ने वाला सामाजिक आचरण और नजरिया भारत में अधिक जजमेंटल है। जैसे कि बायोलॉजी और ह्यूमन रिसोर्सेज लड़कियों के विषय, या ह्यूमैनिटीज उनके जो कम परसेंटेज लाते हैं इत्यादि।
वहां, कई जगहों पर तो अब पाठ्यक्रम को 'विषय' के आधार पर ना कर के 'टॉपिक' के आधार पर करने की भी पहल हुई है। मतलब आप इतिहास नहीं पढ़ेंगे बल्कि ‘सेकेंड वर्ल्ड वॉर’ हेडिंग के अंतर्गत पढ़ेंगे उसी प्रकार फिजिक्स नहीं ‘थर्मोडायनामिक्स के लॉ' पढ़ेंगे इत्यादि।
3) डिफरेंस नं 3 – पढ़ाने के तरीके
भारतीय स्कूल अक्सर ट्रेडिशनल टीचिंग मेथड्स जैसे लेक्चर देना, नोट्स लिखवाना और होमवर्क असाइनमेंट का प्रयोग करते हैं। इसके विपरीत, यूरोपीय और अमेरिकी स्कूल अधिक इंटरैक्टिव टीचिंग मेथड्स को शामिल करते हैं, जैसे ग्रुप-वर्क, प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग और ऑनलाइन शिक्षा।
जरा सोचिए कक्षा छठी में आपको 'अकबर का राज्याभिषेक कब हुआ था?’ यह डेट रटवाने के बजाय कहा जाता कि एक फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन है जिसमें सब बच्चे मुगल दौर के समय पहने जाने वाले कपड़े पहन कर आएंगे या फिर मुगल दौर में बनाई जाने वाली डिशेस बनाकर घर से लेकर आएंगे या स्कूल में बनाएंगे!
ये ऐसी लर्निंग होती जो विषय में आपकी रुचि बढ़ाती, विषय आप को बोझ नहीं लगता, आपको एजुकेशन का दैनिक जीवन में उपयोग समझाती और जीवन भर आपके साथ बनी रहती।
इन तीन मुख्य अंतरों के अलावा स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर की क्वालिटी, टीचर्स के वेतन भत्ते, उन्हें मिलने वाली सुविधाओं, ट्रेनिंग आदि की कमी के बारे में कौन नहीं जानता। भारत में एक बड़ी समस्या स्कूलों में टीचर्स के अनुपस्थिति (खासतौर पर ग्रामीण सरकारी स्कूलों में) की भी है।
कहते हैं किसी वस्तु की कमी का 'एक्सेप्टेंस' उस क्षेत्र में 'डेवलपमेंट' की पहली कड़ी है। भारतीय स्कूलों में अमेरिका और यूरोप के स्कूलों की तुलना में 'कमियों का इशारा' और 'सुधार की आशा' शायद हमारे लिए भी ऐसा ही एक कदम हो।


टिप्पणियाँ