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एक्सीडेंट में दोस्त की मौत हो गई तो मां ने कहा - बेटे को हेलमेट दिया होता तो आज वह जिंदा होता, इसलिए राघवेंद्र कुमार बन गए' ' हेलमेट मैन ऑफ इंडिया'', हेलमेट बांटने के लिए सब कुछ बेच दिया

9 साल पहले सड़क हादसे में दोस्त की मौत हुई। वह अपने मां-बाप की इकलौती संतान था। उसकी मां बार-बार कह रही थी, ‘बेटे को सबकुछ दिलाया, लेकिन हेलमेट नहीं दे पाई। अगर उसने हेलमेट पहना होता तो जिंदा होता।’

उसी दिन मैंने तय किया कि अब किसी मां का आंचल इस तरह सूना नहीं होने दूंगा। मैं सड़कों पर घूम-घूमकर हेलमेट बांटने लगा। इसे अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया। ऐसा मिशन कि इसके लिए अपना घर तक बेच दिया। पत्नी के गहने भी गिरवी रख दिया।

मैं राघवेंद्र कुमार। लोग मुझे हेलमेट मैन ऑफ इंडिया के नाम से जानते हैं। 28 अप्रैल 2014 की बात है। मैं कंपनी के काम से कोलकाता गया था। रूममेट कृष्णा ने फोन किया और पूछा- आप वापस कब आएंगे। मुझे एक रिश्तेदार के यहां जाना है। मैंने कहा कि मैं तो कल तक आऊंगा, तुम आराम से रिश्तेदार के यहां चले जाओ।

अगले दिन रात में एक दोस्त का फोन आया कि कृष्णा का एक्सीडेंट हो गया है, वह अस्पताल में है। मैंने फ्लाइट पकड़ी और कोलकाता से सीधे नोएडा पहुंच गया। कृष्णा के सिर में गहरी चोट लगी थी, लेकिन वह बात कर रहा था।

शाम होते-होते उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। कुछ देर बाद वह कोमा में चला गया। उसे वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया।

वहां मुझे पता चला कि कृष्णा बाइक से यमुना एक्सप्रेसवे से गुजर रहा था। रास्ते में एक टैंकर ने पीछे से टक्कर मार दी। उसे गहरी चोट लगी थी। आने-जाने वालों को वह हाथ दे रहा था कि कोई उसे अस्पताल पहुंचा दे, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। देर शाम होने पर एक कार वाले ने उसे अस्पताल पहुंचाया।

कृष्णा को कई दिनों से होश नहीं आ रहा था। इलाज का खर्चा भी बढ़ गया। फिर हम दोस्तों ने आपस में पैसे इकट्ठे किए। कुछ लोगों से मांगे। 20 लाख रुपए उसके इलाज में लगा। 7 दिनों तक वह वेंटिलेटर पर रहा। 8वें दिन उसकी मौत हो गई।

उसके अंतिम संस्कार में सभी लोग शामिल हुए, लेकिन मैं नहीं जा पाया। मेरी हिम्मत ही नहीं हुई उसे जलता देखने की। तीन महीने तक तो मैं उस कमरे में नहीं गया, जहां वह रहता था। मेरी हिम्मत ही नहीं होती थी।

वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। शादी के 20 साल बाद पैदा हुआ था। उसके माता-पिता की हालत देखकर मुझे और तकलीफ होती थी।

कृष्णा की मौत का मुझे गहरा सदमा लगा। वह सिर्फ मेरा रूममेट नहीं था, भाई की तरह था। मैं बिहार के कैमूर से हूं और वह मधुबनी से था। इस वजह से भी दोनों के बीच शानदार ट्यूनिंग थी। वह मुझे भैया ही बोलता था।

तब मैं लॉ कर रहा था और वह मैकेनिकल इंजीनियरिंग। क्लास के बाद मैं पार्ट टाइम जॉब भी करता था। रात का खाना मेरे लिए कृष्णा ही बनाता था। सुबह मेरे कपड़े भी प्रेस कर देता था। छोटे भाई की तरह मेरी हर जरूरत का ख्याल रखता था।

उसकी मौत के कुछ दिन बाद मैंने हिम्मत करके उसकी मां को फोन लगाया। मेरी आवाज सुनते ही वह रोने लगीं। काफी देर तक रोती रहीं। कहने लगीं कि तुम तो आखिरी वक्त में नहीं आए...वह बार-बार यही शिकायत कर रही थीं। मैं कैसे उस मां को समझाता कि मैं क्यों नहीं आया। मैं नहीं देख सकता था कृष्णा को जलते हुए।

इसके बाद तय किया कि कृष्णा के गांव जाकर उसके माता-पिता से मिलूंगा। एक दोस्त के साथ अपनी कार में नोएडा से मधुबनी के लिए निकल गया। घर पहुंचे ही कृष्णा की मां मुझसे लिपटकर रोने लगीं। इतना रोईं कि बता नहीं सकता।

कृष्णा का घर वीरान हो गया था। पूजा घर वाले कमरे में सारे भगवान बिखरे हुए थें। उन पर धूल जम चुकी थी। आंगन में कटा हुआ आम का पेड़ था। उसकी मां ने बताया कि कृष्णा को आम बहुत पसंद थे। जब वो नहीं रहा तो यह पेड़ रहकर क्या करेगा। तकलीफ होती थी इसलिए कटवा दिया।

कृष्णा की मां बार-बार कह रही थीं कि बेटे को बाइक दिलाई, लेकिन हेलमेट नहीं दिया। अगर हेलमेट दी होती, तो आज वह जिंदा होता। उनकी यह बात मुझे झकझोर रही थी। उसी दिन मैंने उनसे वादा किया कि कुछ तो ऐसा करूंगा, जिससे फिर किसी मां को इस तरह अपना बेटा न खोना पड़े।

4 दिन कृष्णा के घर रहा। उसकी मां ने अपने बेटे की तरह ही मुझे प्यार-दुलार दिया। अपने हाथ से चावल चुनकर मुझे खाना खिलाती थीं। वे लोग नहीं चाहते थे कि मैं वापस नोएडा जाऊं, लेकिन मैं वहां कब तक रहता।

नोएडा वापस आने के बाद भी हर दिन कृष्णा की यादों में खोया रहता था। कृष्णा का भैया-भैया कहकर पुकारना, उसकी मां का रोना, उसके पिता के आंसू। सब कुछ मेरी आंखों में सोते-जागते नाचता रहता था।

जब मैं सड़क पर कहीं आता-जाता तो कई लोग बिना हेलमेट के बाइक चलाते मिलते। उन्हें देखकर मुझे कृष्णा और उसकी मां की हेलमेट वाली बात याद आने लगती थी। मैं सोचने लगता था कि आखिर क्यों लोग अपनी जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं, क्यों खुद को मौत के मुंह में धकेल रहे हैं। आखिर कैसे इन्हें रोका जा सकता है।

अक्सर टीवी और अखबारों में भी सड़क हादसे में जान गंवाने वालों की खबरें देखने-पढ़ने को मिलती थीं। मैंने ठान लिया कि अब लोगों को हेलमेट बांटूंगा। तब तक एक मल्टी नेशनल कंपनी में मेरी जॉब लग गई थी। ट्रेडिंग भी करता था। ठीक-ठाक कमाई हो जाती थी।

अगले दिन हेलमेट खरीदने एक दुकान पर गया। दुकानदार से कहा कि मुझे 1 लाख 46 हजार रुपए का हेलमेट चाहिए। दुकानदार चौंक गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतना ज्यादा हेलमेट क्यों चाहिए।

शुरुआत में उसे मजाक लगा। जब मैंने पैसे निकाले तो वह कहने लगा कि आप मेरी दुकान खाली कराना चाहते हो क्या, या खुद की दुकान खोलना चाहते हो। मैंने बताया कि मुझे हेलमेट लोगों के बीच बांटना है। फिर भी उसे यकीन नहीं हो रहा था।

खैर मैं हेलमेट लेकर पटना पहुंचा। वहां चौराहे पर लोगों को रोक-रोक कर हेलमेट देने लगा। हाथ जोड़ कर बोलता कि भाई हेलमेट पहनो। लोग आने लगे, फोन करके अपने दोस्तों को बताने लगे कि यहां हेलमेट बंट रहे हैं। धीरे-धीरे भीड़ जमा होने लगी।

हेलमेट बांटना मेरा मिशन बन गया। देश के अलग-अलग शहरों में जाकर हेलमेट बांटने लगा। पार्क में जाकर युवाओं से कहता था कि कल अपने दोस्तों को भी लाना और हेलमेट लेकर जाना।

एक बार पटना में हेलमेट बांट रहा था। कुछ पुलिस वाले मुझसे हेलमेट मांगने लगे। मैंने दे भी दिए। कुछ दिनों बाद वे कहने लगे कि आपको हेलमेट बांटने के लिए परमिशन लेनी होगी। वर्ना भीड़ को कौन कंट्रोल करेगा।

मैंने कहा ठीक है। आगे से परमिशन लेकर बांटूंगा। अगले दिन मैं उनसे परमिशन लेने के लिए गया। उन्होंने कई सवाल पूछे कि मैं कौन हूं, क्यों हेलमेट बांट रहा हूं, किस संस्था से हूं, कौन बंटवा रहा है, कोई साजिश तो नहीं।

कई बार ऐसा होता था कि हेलमेट मैं बांटता था और खबर छपती थी कि पुलिस हेलमेट बंटवा रही है। इस तरह की चीजों से मुझे काफी तकलीफ होती थी।

कोविड में लोग मास्क और भोजन के लंगर लगा रहे थे। मुझे लगा कि जो लोग घर वापस जा रहे हैं, उन्हें भी तो हेलमेट की जरूरत है। मैंने पत्नी के गहने गिरवी रखकर दो ट्रक हेलमेट खरीदे। एक ट्रक बनारस भेजा और एक ट्रक नोएडा। दोनों जगहों पर आने-जाने वाले लोगों को हेलमेट बांटे।

इसके बाद मैंने एक अभियान शुरू किया टीका लगवाओ और हेलमेट पाओ। जो लोग टीका लगवाकर आते थे, उन्हें हेलमेट देता था। इससे लोगों में वैक्सीनेशन को लेकर भी जागरूकता बढ़ी।

फिलहाल मैं हेलमेट बैंक बना रहा हूं। एक हेलमेट ले जाओ और आठ दिन के बाद वापस करो ताकि हमारे लोग उसकी सफाई कर सकें। मैं मशाल यात्रा भी निकालता हूं। चार साल के बच्चे को भी हेलमेट देता हूं ताकि वह अपने पापा को बोले कि हेलमेट लगाकर जाएं।

उत्तराखंड सरकार के साथ काम कर रहा हूं। बिहार सरकार ने मुझे द हेलमेट मैन ऑफ इंडिया का खिताब दिया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और सोनू सूद ने मेरे काम को सराहा है। हजारों लोग सोशल मीडिया पर मेरा हौसला बढ़ाते हैं। अपने जन्मदिन पर मुझे हेलमेट भेजते हैं, ताकि मैं उसे बांट सकूं।

कई लड़कियां मुझे राखी भेजती हैं। उन्हें मैं हेलमेट भेजता हूं। जो लोग हेलमेट नहीं खरीद पाते, कूरियर के जरिए उनके घर हेलमेट भेजता हूं।

मैंने एक और मिशन शुरू किया है। हर दिन मैं कहीं ना कहीं पार्क और चौराहों पर हेलमेट का स्टॉल लगाता हूं। लोग आते हैं पुरानी किताबें देते हैं और बदले में हेलमेट ले जाते हैं। ये किताबें जरूरतमंदों को दी जाती हैं। गरीब बच्चों के लिए 1400 लाइब्रेरी भी बनवा चुका हूं।

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