पीपुल्स रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी के एक सर्वे के अनुसार पैसे से ख़ुशहाली का ज़्यादा कुछ लेना-देना नहीं है।
इस रिसर्च के अनुसार ज़रूरत से कम और ज़रूरत से ज़्यादा पैसा हमारी ख़ुशहाली को कम करता है। इस निष्कर्ष से यह कहानी झूठी पड़ती है जो अक्सर सुनने को मिलती है कि ज़्यादा पैसा होंगे तो ज़्यादा ख़ुशहाली आएगी। यह रिसर्च कहती है कि मिडिल क्लास के हिस्से में सबसे ज़्यादा ख़ुशी आती है। फ़िलहाल भारत में मिडिल क्लास आबादी का प्रतिशत 30% है जो कि कई देशों से ज़्यादा है।
इस तीस प्रतिशत आबादी की आय पाँच लाख से तीस लाख प्रति वर्ष है। हालाँकि मिडिल क्लास की इनकम को अलग-अलग समय पर अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया जाता रहा है, लेकिन फ़िलहाल इसे पाँच से तीस लाख सालाना माना गया है। भारत के लिए ज़्यादा बड़ी ख़ुशी की बात यह है कि 2047 तक मिडिल क्लास आबादी का प्रतिशत 63% तक पहुँच जाएगा। यानी आज़ादी के सौ साल बाद भारत की ख़ुशहाली दुगनी से भी ज़्यादा हो जाएगी।
2004-05 तक मिडिल क्लास आबादी देश में मात्र चौदह प्रतिशत थी। आज़ादी के वक्त तो मिडिल क्लास केवल दो प्रतिशत ही हुआ करता था। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश में बावन प्रतिशत आबादी वह है जो अगले वर्षों में मिडिल क्लास होने वाली है।
हैरत की बात यह है कि आज भी ज़्यादातर योजनाएँ, नीतियाँ या तो ग़रीबों के लिए बनाई जाती हैं या अमीरों के हित को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। ग़रीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ बनाने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। होनी भी नहीं चाहिए। लेकिन मिडिल क्लास की सुविधाओं, सहूलियतों की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए। आख़िर खुशहाल देश को और खुशहाल बनाने का तरीक़ा ही क्या है?
ग़रीबों के उत्थान की योजनाएँ ही उन्हें मिडिल क्लास श्रेणी में लाकर खुशहाल बनाएँगी और मध्यम वर्ग को सहूलियतें, राहतें मिलती रहेंगी तो वह और ज़्यादा खुशहाल होगा। हो सकता है वो अपने उन क़रीबियों को पकड़कर भी मध्यम वर्ग में लाने की कोशिश करेगा जो अभी पिछड़े हुए हैं या ग़रीबी वाला जीवन जी रहे हैं। वैसे हो उल्टा रहा है। हमारी सरकारें तो अक्सर यह कहते हुए सुनी जाती हैं कि मध्यम वर्ग को सहूलियत देने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं है। वो अपना खुद देख लेगा।
हो सकता है यह रिसर्च हमारी सरकारों को भी समझ में आ जाए और वे मध्यम वर्ग की ओर भी ध्यान दे सकें। आख़िर देश को चलाता तो मध्यम वर्ग ही है। अपने काम से, अपनी कड़ी मेहनत से और सीधे तनख़्वाह में से ही कट जाने वाले भारी-भरकम टैक्स से। दरअसल सरकारें मध्यम वर्ग से सिर्फ़ लेना ही जानती हैं। देना नहीं चाहतीं। जबकि मध्यम वर्ग किसी सरकार से कुछ माँगता नहीं। वह तो कुछ सहूलियतें चाहता है। छोटी-छोटी राहतों की उम्मीद करता है।
अपनी मेहनत के बदले कुछ ज़्यादा पैसे की उम्मीद, काम के दौरान कुछ सहूलियतों की उम्मीद और सीधे तनख़्वाह में से ही कट जाने वाले टैक्स में थोड़ी-सी राहत की उम्मीद।

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