क्यों बदला जाता है जगन्नाथ मंदिर का ध्वज रोज, रथ बनाने की प्रक्रिया, प्रसाद में क्या खास होता है, जानें सब कुछ जो आपके मन में है बातें
भगवान जगन्नाथ की नगरी पुरी इन दिनों गुलजार है। शहर की रौनक देखते ही बनती है। चिलचिलाती धूप में भी लोगों के चेहरे पर जरा सी भी शिकन नहीं है। दो दिन बाद यानी रविवार से रथ यात्रा के लिए रथ बनना शुरू हो जाएंगे। उसके लिए लकड़ियां इकट्ठी की जा रही हैं। करीब 2 महीने बाद रथ तैयार हो जाएंगे। उसके बाद 9 दिनों की रथ यात्रा शुरू होगी।
धोती पहने दो नौजवान आते हैं। उनके पीठ पर अलग-अलग तरह के झंडे बंधे हैं। वे मंदिर की दीवार की तरफ पीठ करके खड़े हो जाते हैं। जय जगन्नाथ का जयकारा आसमान में गूंजने लगता है। दोनों युवा पीठ की तरफ से ही तेजी से मंदिर के ऊपर चढ़ने लगते हैं। चंद मिनटों में ही वे ऊपर गुंबद के पास पहुंच जाते हैं। इसके बाद वे आगे की तरफ मुड़ जाते हैं। हाथ के सहारे ऊपर चढ़ने लगते हैं। कुछ मिनटों में वे मंदिर के शिखर पर पहुंच जाते हैं। सबसे पहले वे पुराने ध्वज को उतारते हैं। फिर नया ध्वज लगाते हैं। इसके बाद ऊपर से ही मशाल लहराते हैं। नीचे मौजूद लोग दूर से ही मशाल की बल्लियों की आरती लेते हैं। हर दिन इसी तरह मंदिर के शिखर पर चढ़कर ध्वज बदला जाता है। एक दिन भी इसे टाला नहीं जा सकता है। इसमें एक दिन भी चूक नहीं होती है। चाहे बारिश आए या तूफान। मान्यता है कि अगर एक दिन ध्वज नहीं बदला गया तो 18 साल के लिए मंदिर बंद हो जाएगा।
मंदिर के मुख्य द्वार से पहले बाहर एक स्तंभ है, जिसके चारों ओर परात रखी हैं, जिसमें लोग पैसे चढ़ा रहे हैं। फिर एक द्वार है, जिसके दरवाजों पर सिंह बने हुए हैं। इसे सिंह द्वार कहा जाता है।
सुबह 5 बजे दरवाजा खुलता है। पुजारी लाइट जलाते हैं। आरती होती है। फिर सब आगे बढ़ते हैं। 6-7 फीट चौड़ी 14 सीढ़ियां हैं। यहां से भक्त लेट-लेटकर आगे बढ़ते हैं। मान्यता ये कि ऐसा करने से नुकसान पहुंचाने वाले ग्रहों से मुक्ति मिलती है।
गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा की मूर्तियां हैं। सभी मूर्तियां लकड़ी की बनी हैं। यहां पूजा के विधि-विधान भी खास हैं। भगवान को नहलाना हो, वस्त्र पहनाना हो, सब्जी काटनी हो, पानी लाना हो, सामान समेटना हो या भोग लगाना हो, हर काम के लिए एक-एक व्यक्ति है। वही हर दिन उस काम को करेगा, कोई दूसरा नहीं। भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलराम। इन तीनों की मूर्तियां मंदिर में मौजूद हैं।
मंदिर के पुजारी सूर्यनारायण रथ शर्मा बताते है, ‘सुबह भगवान उठने के बाद दंत-मंजन करते हैं। उन्हें लकड़ी और कपूर दिया जाता है। फिर वे बिंब स्नान करते हैं। यानी सात हाथ की दूरी से शीशे में अपना बिंब देखते हैं। वह शीशा सूर्य का प्रतीक होता है और मंत्रों से स्थापित किया जाता है।
साल में एक बार बरसात के मौसम में भगवान प्रत्यक्ष स्नान भी करते हैं। यानी वे पानी से नहाते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब वे पानी से नहाते हैं, तो उन्हें बुखार आ जाता है। इसके बाद 15 दिन तक वे आराम करते हैं। इस दौरान उनका दर्शन नहीं होता है। पूजा की विधि भी बदल जाती है। उन्हें सिर्फ सफेद फूल चढ़ाया जाता है। सफेद कपड़े पहनाए जाते हैं।
इसके बाद फुलरी के तेल से उनकी मालिश होती है। इलाज के लिए राजवैद्य को बुलाया जाता है। वे आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां देते हैं। इसको लेकर पुरी में एक कहावत भी है कि एलोपैथ से दूर रहो, क्योंकि जगन्नाथ भी आयुर्वेद लेते हैं।
स्नान के बाद भगवान का श्रृंगार होता है। भोग लगता है। सालधूप पूजा होती है। इसके बाद दोबारा श्रृंगार किया जाता है। यही प्रक्रिया दोपहर और शाम में भी दोहराई जाती है। शाम में भोग लगने के बाद भगवान सोने के लिए जाते हैं। इसके लिए पलंग लगाया जाता है। गद्दा डाला जाता है। उनके लिए पान, पानी और नारियल रखा जाता है। इस पूरे काम के लिए 119 लोग लगते हैं। जगन्नाथ भगवान की रसोई, दुनिया की सबसे बड़ी रसोई मानी जाती है। करीब 1500 लोग मिलकर यहां प्रसाद तैयार करते हैं।
गर्भगृह के दाहिने हाथ की तरफ आनंद बाजार है। मिट्टी की हांडियों में दाल-भात रखे हैं। हर पांच कदम पर धोती पहने लोग दाल-भात बेच रहे हैं। दाल-भात यहां का प्रसाद है। किसी को होटल में खाना ले जाना हो, घर ले जाना हो या यहां बैठकर खाना हो, हर तरह की व्यवस्था है।
एक आदमी को खाना हो तो 100 रुपए का प्रसाद आता है। इसमें दाल, भात, सब्जी और खीर होती है। एक हांडी भर के खाना ले जाना हो, तो उसके लिए 300 रुपए देने होते हैं।
मुझे बताया गया कि यहां 56 प्रकार के प्रसाद बनते हैं। इसमें नारियल के लड्डू, मावे के लड्डू, दही चावल, अलग-अलग तरह के पेठा, मालपुआ, दाल-भात, कई प्रकार की सब्जियां, खीर, खिचड़ी जैसी चीजें शामिल होती हैं। प्रसाद बनाने के लिए कुएं के पानी का इस्तेमाल होता है, जिसे सोने के घड़े से निकाला जाता है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि ये प्रसाद 742 चूल्हों पर एक साथ बनते हैं। इसके लिए एक के ऊपर एक आठ हांडियां चढाई जाती हैं। सबसे पहले ऊपर वाली हांडी का खाना पकता है, उसे उतारा जाता है, फिर नीचे वाली का पकता है। इस तरह आठों हांड़ियों से खाना उतारा जाता है। यही प्रक्रिया सभी 742 चूल्हों के लिए अपनाई जाती है। प्रसाद बनाने के लिए करीब 1500 लोग लगते हैं। मिट्टी की हांडी में बना दाल-चावल ही यहां का प्रसाद है। एक हांडी प्रसाद की कीमत करीब 300 रुपए है।
इस मंदिर की मूर्तियां बदली भी जाती हैं। हिंदू पंचांग के मुताबिक जब कभी साल में दो आसाढ़ लगता है, तब भगवान की मूर्ति बदली जाती है। ऐसा 12-15 सालों में एक बार होता है। उस वक्त पूरे शहर की बिजली काट दी जाती है। अंधेरा कर दिया जाता है। मंदिर के बाहर कड़ा पहरा होता है, ताकि कोई बाहर से अंदर नहीं आ सके।
जिस पुजारी की जिम्मेदारी होती है मूर्ति बदलने की, उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है। ताकि वे मूर्ति के ऊपर के ब्रह्म पदार्थ को नहीं देख सकें। ये ब्रह्म पदार्थ क्या है, किसी को नहीं पता। नई मूर्ति उसके ऊपर ही रख दी जाती है।'
मंदिर के पास ही थोड़ी दूरी पर गजपति यानी पुरी के राज घराने का महल है। हर साल इसी महल के सामने रथ यात्रा के लिए रथ तैयार किया जाता है। गजपति को भगवान जगन्नाथ का सेवक कहा जाता है।
महाराणा कम्युनिटी (कारपेंटर्स) के लोग सबसे पहले सोने की कुल्हाड़ी से लकड़ी पर प्रहार करते हैं। उसके बाद रथ बनाने का काम शुरू हो जाता है।
इन दिनों रथ बनाने के लिए लकड़ियां इकट्ठी की जा रही हैं। इन लकड़ियों पर तिलक लगे हैं। चुनरी बांधी गई हैं। आते-जाते भक्त इन लकड़ियों को प्रणाम कर रहे हैं। हाथ से छूने की कोशिश कर रहे हैं। इन्हीं लकड़ियों से अक्षय तृतीया यानी 23 अप्रैल के दिन विधि विधान से जगन्नाथ भगवान का रथ बनना शुरू होगा।
रथ बनाने के लिए जंगल से लकड़ियां लाई जाती हैं। उससे पहले वन विभाग का अधिकारी मंदिर को सूचना भेजता है। फिर पुजारी जंगल में जाते हैं। पेड़ों की पूजा करते हैं।
इसके बाद सोने की कुल्हाड़ी से पेड़ पर कट लगाया जाता है। यह कट सदियों से महाराणा लोग (कारपेंटर) लगाते आ रहे हैं। पेड़ के गिरने के बाद भी उसकी पूजा की जाती है। फिर 12-12 फीट के तनों की पूजा की जाती है। इन्हीं तनों से रथ पर खंभे बनाए जाते हैं।
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 9 दिनों तक चलती है। इसकी शुरुआत हर साल आसाढ़ महीने के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि से होती है।
रथ बनाने में आमतौर पर नीम और हांसी की लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है। जिसे कोड़दा, नयागांव, दसपला, गंजाम के जंगलों से लाया जाता है। मंदिर कार्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक रथ यात्रा के लिए तीन रथ बनाए जाते हैं। इन्हें बनाने में 884 पेड़ों के तने लगते हैं। ये 12-12 फीट के होते हैं।
पुरी के वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन मिश्रा बताते हैं, ‘रथ बनने में करीब दो महीने लगेंगे। रथ की लकड़ी चुनने में बहुत सावधानी बरती जाती है। कोई कील वाली या कटी लकड़ी का इस्तेमाल नहीं होता है।
रथ बनाने वाले दिन में एक बार ही सादा भोजन करते हैं। इस दौरान उन्हें पूरी तरह सात्विक तरीके से रहना होता है। वे पत्नी के साथ नहीं सोते हैं। घर में कोई अनहोनी हो जाए, तो रथ बनाने के काम से उन्हें हटना पड़ता है।
रथ यात्रा के पीछे की कहानी- ‘एक बार भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की इच्छा जाहिर की थी। तब जगन्नाथ जी और बलराम अपनी बहन को रथ पर बैठाकर नगर दिखाने निकल पड़े। इस दौरान वे मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर भी गए और वहां कुछ दिन रुके थे। तभी से यहां हर साल रथ यात्रा निकाली जाती है।’
# सभी जानकारी पुजारियों के अनुसार




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