मनोविज्ञान में मूर्खता जैसी कोई चीज नहीं, बच्चों को कीड़े पीसकर पिलाए ताकि वे उड़ सकें लोगों ने कहा मूर्ख, बाद में बने बड़े वैज्ञानिक
टीम इंडिया के पूर्व कैप्टन विराट कोहली ने 30 मार्च को सोशल मीडिया पर अपनी 10वीं क्लास की मार्कशीट शेयर की। विराट को गणित में 51, जबकि साइंस में 55 नंबर ही मिले। IPL-2023 के शुरू होने से पहले भारत के स्टार बल्लेबाज और आरसीबी के दिग्गज खिलाड़ी विराट कोहली ने ये मार्कशीट शेयर करते हुए लिखा कि ये कितना मजेदार है कि जो चीजें आपकी मार्कशीट में सबसे कम हैं, वहीं आपकी जिंदगी में सबसे ज्यादा जुड़ती हैं। विराट का इशारा साफ है कि भले ही उनके मैथ्स और साइंस में कम नंबर आए हों, मगर क्रिकेट के गणित और साइंस में वो अव्वल हैं।
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| विराट कोहली ने किया अपना मार्कशीट शेयर |
कोहली क्रिकेट के कई रिकार्ड्स के मामले में नंबर वन रहे हैं, मगर स्कूल में वो कमजोर स्टूडेंट रहे। इससे पहले उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि मुझे क्रिकेट में उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ी, जितनी गणित में पासिंग मार्क्स पाने के लिए करनी पड़ी थी।
10वीं में मैथ्स में 36, साइंस में 38 नंबर मिले, मगर बने IAS
बीते साल जून में गुजरात के भरूच के जिलाधिकारी रहे IAS तुषार सुमेरा की 10वीं की मार्कशीट सोशल मीडिया पर शेयर हुई, जिसमें उन्हें मैथ्स में 36, साइंस में 38 और इंग्लिश में महज 35 नंबर मिले थे। IAS अवनीश शरण ने बताया कि इन नंबरों की वजह से स्कूल में कहा जाता था कि तुषार कुछ नहीं कर सकता।
आज दुनियाभर में ‘अप्रैल फूल्स डे’ मनाया जा रहा है। लोग यूं ही किसी को मूर्ख कह देते हैं। मगर, यह कितना सही है, इसी दिन के बहाने इसकी पड़ताल करेंगे। सबसे आखिर में उस वैज्ञानिक की कहानी भी बताएंगे, जिसने बचपन में अपने सहपाठियों को कीड़े पीसकर इसलिए पिला दिया कि शायद वो चिड़िया की तरह उड़ सकेंगे।
समाज ने पूर्वाग्रह के आधार पर गढ़ी मूर्ख की परिभाषा
बीएचयू में समाजशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा गोंड कहती हैं कि जब हम अपनी सोसायटी का ढांचा देखते हैं तो हर चीज की एक परिभाषा है। जैसे पुरुष के बारे में कहा जाता है कि चौड़े कंधे और सीना, बलशाली भुजाएं और बुलंद आवाज ही उसके हैंडसम होने की परिभाषा है। वैसे ही समाज ने महिलाओं की सुंदरता के लिए गोरा रंग, सौम्य, कोमल आवाज जैसे पैरामीटर्स बनाए हैं। इसी तरह मूर्ख और बुद्धिमान के पैरामीटर्स हैं। ये सारे पैरामीटर्स समाज की एकतरफा सोच के आधार पर बने हैं।
मनोविज्ञान में मूर्खता जैसी कोई चीज ही नहीं, ये आम बोलचाल का शब्द
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ साइकोलॉजी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तुषार सिंह कहते हैं कि आम बोलचाल की भाषा में मूर्ख उसे कहा जाता है, जो अपने काम में गलती कर देता है या काम ठीक से नहीं कर पाता। मगर, मनोविज्ञान में मूर्खता या मूर्ख जैसा कोई शब्द नहीं है। यहां व्यक्ति को बुद्धिमत्ता के स्तर से आंका जाता है।
मनोविज्ञान में बुद्धिमत्ता के भी कई स्तर हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि व्यक्ति अपने रोजाना के जीवन की समस्याओं को कैसे सुलझाता है? बुद्धिमत्ता का सबसे निचला स्तर ‘मेंटली रिटार्डेड’ (मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति) है। ये ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिनका इंटेलीजेंस विकसित नहीं होता। वो दूसरों की मदद के बिना जीवन में कुछ नहीं कर पाते।
बुद्धिमत्ता का सबसे ऊंचा स्तर ‘तीव्र बुद्धि’ है। यानी व्यक्ति का प्रतिभाशाली होना। ऐसे लोग जो अपनी उम्र के लोगों के मुकाबले हर काम में बेहद कुशल होते हैं। जिनमें मध्यम स्तर की बुद्धिमत्ता होती है, उसे ‘औसत बुद्धि’ कहा जाता है। ज्यादातर लोग इसी कैटेगरी में आते हैं।
मनोविज्ञान में IQ के लेवल से नापी जाती है बुद्धिमत्ता
‘IQ’ शब्द जर्मन भाषा के ‘इंटेलिजेंस कोशेंट’ से आया है, जिसका पहली बार प्रयोग जर्मन मनोवैज्ञानिक विलियम स्टर्न ने 1912 में किया था। मनोविज्ञानी थार्नडाइक के मुताबिक, IQ तर्क करने और चुनौतियों से पार पाने का पैमाना है। यह दूसरे व्यक्तियों के मुकाबले किसी एक के दिमाग के स्तर को बताता है।
हालांकि, समाजशास्त्र बुद्धिमत्ता नापने के इस मनोवैज्ञानिक पैमाने को सही नहीं मानता है।
आईक्यू तर्क नापने का तरीका, इसे बुद्धि का पैमाना मानना गलत
डॉ. प्रतिमा कहती हैं कि किसी का आईक्यू लेवल रीजनिंग के चंद सवालों के आधार पर मापा जाता है। मगर, यह बुद्धिमत्ता का पैमाना नहीं हो सकता। संभव है कि किसी की रीजनिंग कमजोर हो, मगर दूसरी जगहों पर वह अच्छा परफॉर्म करता हो। बायोलॉजिकल रूप से महिला संकेतों को ज्यादा समझती है, जबकि पुरुष टेक्निकल चीजों को ज्यादा समझता है।
जैसे किसी महिला कहीं जाना है तो वह जाते हुए रास्ते में मंदिर या किसी दुकान को लैंडमार्क की तरह याद रखती है, जबकि पुरुष उस दूरी को किलाेमीटर या समय से मापता है। इन दोनों में से कोई भी कम बुद्धिमान नहीं है।
महिलाओं को बात-बात पर मूर्ख कहना पितृसत्तात्मक सोच
डॉ. प्रतिमा कहती हैं कि मूर्ख या बुद्धिमान समझ का विषय होता है। जैसे एक महिला को उसका बेटा, पति सभी बात-बात पर मूर्ख कह देते हैं। यह पितृसत्तात्मक समाज की सोच है, जो सदियों से चली आ रही है। इसके अलावा समाज के पैमानों और कामयाबी के आधार पर भी किसी को मूर्ख या बुद्धिमान कह दिया जाता है।
समाजशास्त्र में मूर्खता या बुद्धिमत्ता को ‘बोध’ से मापा जाता है। यानी आपकी विषय पर समझ कितनी है, इस पर निर्भर करता है। ऐसा भी हो सकता है कि परिवार का कम पढ़ा लिखे सदस्य का बोध या समझ कुछ मामलों में बाकी सदस्यों से बेहतर हो।
दो शख्सियतों जो हमारे-आपके बीच से ही निकली हैं। इन्हें भी लोगों ने बेकार बताया, मगर आज वो खास मुकाम पर हैं।
मुकेश जैन: नौवीं तक पढ़ाई, कमीशन एजेंट-सेल्समैन बने, आज टर्नओवर 20 करोड़
बड़ौत के मुकेश जैन ने नौवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। पिता ने यहां तक कहा कि यह लड़का कुछ नहीं कर पाएगा। मुकेश कम उम्र में ही चांदनी चौक में सेल्समैन बने।
मुकेश जैन का कारोबार पूरे उत्तर भारत में फैला हुआ है।
मुकेश जैन ने कमीशन एजेंट का काम किया और सूरत जाकर कपड़ों के बिजनेस को देखा और समझा। उन्होंने सूरत-अहमदाबाद से कपड़ा खरीदकर दिल्ली में बेचना शुरू किया। आज मुकेश जैन का पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक बिजनेस फैला है। उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर 20 करोड़ है।
पूजा शाही: इंटर तक पढ़ीं, अब उनके बनाए खिलौने, जूलरी जर्मनी-अमेरिका तक फेमस
यूपी में देवरिया की पूजा शाही महज इंटर तक पढ़ी-लिखी हैं। उन्होंने हैंडीक्रॉफ्ट का काम सीखा और सिखाया। आज पूजा की खुद की कंपनी ‘अर्जन क्राफ्ट’ है, जिसका टर्नओवर लाखों में है।
पूजा शाही बनाए हैंडीक्रॉफ्ट अमेरिका और जर्मनी भेजे जाते हैं। अपनी कंपनी में उन्होंने 200 से अधिक महिलाओं को रोजगार भी दिया है।
तो फिर बुद्धिमान कौन?
मशहूर चिंतक और जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर कहते हैं कि किसी भी चीज के बारे में कितनी समझ है, इस पर व्यक्ति का आकलन होना चाहिए। अपने कामकाज या अपने कर्तव्य के प्रति कोई कितना सचेत, मानवीय मूल्यों वाला और समझदार है, इस आधार पर उसे ज्यादा या कम बुद्धिमान कहा जा सकता है।जो व्यक्ति लोकतांत्रिक तरीके से और खुलकर किसी चीज या विषय पर अपनी समझ बनाता है और उससे जुड़ी नॉलेज हासिल करता है और उसका सही इस्तेमाल भी करता है, वही व्यक्ति इंटेलिजेंट कहलाता है। जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझता और न ही उन्हें निभाता है, उसे मूर्ख कहा जाता है।
निखिल कामत: स्कूल से नफरत, पुराने फोन बेचे और अब युवा अरबपति
ऑनलाइन स्टॉक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ‘जेरोधा’ के को-फाउंडर निखिल कामत देश के सबसे युवा अरबपतियों में से एक हैं। उनके पिता बैंकर थे। परिवार में हर किसी के पास एमबीए और पीएचडी जैसी डिग्री थी, लेकिन निखिल को स्कूल से नफरत थी। 14 साल की उम्र में उन्होंने दोस्त के साथ पुराने फोन बेचने का बिजनेस शुरू किया। मां को पता चला तो उन्होंने सारे फोन तोड़कर फेंक दिए।
अरबपति निखिल कामत आज युवाओं के रोल मॉडल हैं।
घर वालों की नजर में तो वह बुद्धू थे ही, खुद निखिल भी अपनी काबिलियत पर शक करने लगे। फिर पढ़ाई छोड़कर 17 साल की उम्र में उन्होंने एक कॉल सेंटर में 8 हजार रुपए की नौकरी शुरू की। फिर एक साल बाद उन्होंने ट्रेडिंग शुरू की और अपने ही ऑफिस के लोगों का इन्वेस्टमेंट संभालने लगे। 2010 में उन्होंने अपने भाई के साथ ‘जेरोधा’ की शुरुआत की। आज वह हजारों करोड़ रुपए के मालिक हैं।
मूर्खता और बुद्धिमत्ता एक सिक्के के दो पहलू
बीएचयू में ही साइकोलॉजी विभाग में प्रोफेसर योगेश कुमार आर्य कहते हैं कि मूर्खता और बुद्धिमत्ता को एक सिक्के के दो पहलू माना जा सकता है। जहां बुद्धि होते हुए भी गलतियां करना, गलत निर्णय लेना या अपनी बुद्धि का विवेकपूर्ण तरीके से इस्तेमाल न कर पाना या किसी परिस्थिति में Presence of mind का इस्तेमाल न कर पाना मूर्खता माना जा सकता है।
अमेरिका के मशहूर खगोलविद् और वैज्ञानिक कार्ल एडवर्ड सैगन ने एक बार कहा था कि हर बच्चा पैदाइशी वैज्ञानिक होता है। इसका मतलब यह है कि हर इंसान ऐसे तौर-तरीके ईजाद करता है, जिससे वह अपनी जिंदगी बेहतर बना सके। ऐसे में किसी के बुद्धिमान या मूर्ख होने की बात करना ही बेमानी है।
कभी-कभी जुगाड़ भी डिग्री से बड़ा लगता है। लोग ऐसी तरकीबें निकालते हैं कि सोशल मीडिया वाह-वाह कर उठता है।
देसी जुगाड़: घर के पंखे से बना दी डिब्बे में आइसक्रीम
बिजनेस टायकून आनंद महिंद्रा ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें एक महिला सीलिंग फैन चलाकर जुगाड़ से आइसक्रीम बना रही है। वीडियो शेयर होने के बाद अब तक 12 लाख से ज्यादा लोग इसे देख चुके हैं। प्रोफेसर योगेश कहते हैं कि जुगाड़ बनाने वाले भले ही पढ़े-लिखे न हों, मगर वो मूर्ख नहीं हैं। कई बार पढ़े-लिखों लोगों से ज्यादा जुगाड़ू बुद्धिमान होने का सबूत दे देते हैं।
मुस्कुराहट लाने वाली एक कहानी जो बुद्धिमत्ता और मूर्खता के पैमाने को गलत ठहरा देती है।
दोस्तों को उड़ाने के लिए कीड़े पीसकर पिलाए, बाद में बना वैज्ञानिक
5-6 साल का बच्चा रोज चिड़ियों को आसमान उड़ते देखता और सोचता कि ये छोटे-छोटे पक्षी आसमान में कैसे उड़ पाते हैं। उसकी बाल बुद्धि ने इस सवाल का जवाब ढूंढ निकाला। उसने अपनी क्लास में दो-तीन बच्चों को कीड़े पीसकर पानी में पीने के लिए दिए, जिसके बाद उन बच्चों की तबीयत बिगड़ गई। उस बच्चे को स्कूल में प्रिंसिपल और माता-पिता से इस अनोखे एक्सपेरिमेंट के लिए खूब डांट-मार पड़ी।
उसे लोगों ने मूर्ख कहा। प्रिंसिपल का कहना था- ‘हम ऐसे मूर्ख बच्चे को नहीं पढ़ा सकते।’ बच्चा सोचता था कि अगर कीड़े खाकर छोटी सी चिड़िया उड़ सकती है तो उसके दोस्त भी कीड़े खाकर उड़ सकते हैं। इसी ‘मूर्ख बच्चे’ ने आगे चलकर बल्ब बनाया और दुनिया को रोशनी दी। वह बच्चा जाना-माना वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन था।
कभी किसी को मूर्ख मत कहिए और न ही समझिए। संभव है कि भविष्य में वो आपसे ज्यादा काबिल और कामयाब बन जाए। क्योंकि मूर्खता जैसी कोई चीज नहीं होती। दिमाग सबके पास होता है, बस फर्क यह है कि इसका सटीक इस्तेमाल कब और कहां किया जाता है। इसी बात पर बुद्धिमत्ता तय होती है। मजाक करें, मगर आनंद के लिए, पीड़ा पहुंचाने के लिए नहीं।

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