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पत्नी के गहने गिरवी रख मशरूम पाउडर से बना रहे खाखरा, भाखरी; 8 महीने में ही 30 लाख से ज्यादा का टर्नओवर हुआ, कभी 100-200 के लिए दूसरों के थे मोहताज

'हम तीन भाई हैं। घर चलाने, पेट पालने के लिए पापा खेती-मजदूरी करते थे। गांव में नाम मात्र जमीन है। जब मैं 10वीं क्लास में था, तो पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता था। साल 1998 की बात है, गांव में पढ़ने-लिखने का उतना साधन भी नहीं था। मैं पढ़ाई छोड़कर गांव से राजकोट शहर मजदूरी करने के लिए आ गया।

जब शहर आया, तो बमुश्किल से 17-18 साल की उमर रही होगी। लोहे बनाने की फैक्ट्री में काम करने लगा। रोज के 60 रुपए मिलते थे। हर दिन 14-14 घंटे भट्ठी के सामने खड़ा रहता। ऐसा लगता जैसे आग में झुलस रहा हूं। कब तक गुलामी की नौकरी करता…।

पेट काटकर पाई-पाई जमा किया, फिर अपना बाथ एसेसरीज का बिजनेस शुरू किया, लेकिन कोरोना में सब ठप। लाखों रुपए डूब गए। अब फिर से मशरूम से प्रोडक्ट बनाने का कारोबार शुरू किया हूं। 8 महीने में ही 30 लाख से ज्यादा का टर्नओवर हो चुका है।'

गुजरात का राजकोट शहर। दोपहर के 12 बज रहे हैं। एक फ्लैट के एक कमरे में मशरूम पाउडर से बने खाखरा, भाखरी जैसे गुजराती डिशेज को भवेश वागड़िया और उनकी पत्नी ज्योती पैकेजिंग कर रही हैं।

यहीं पर मेरी उनसे बातचीत हो रही है। जब भवेश अपनी पूरी जर्नी बताते हैं, तो इस दौरान वो कई बार बोल पड़ते हैं, ‘मैं तो गिर कर खड़ा हुआ हूं। जिस तरह कोई जहाज पानी में डूब जाता है, मैं भी डूब गया था। 100-200 रुपए के लिए दूसरों का मोहताज था।'

2020 का साल था। कोरोना के दौरान मैं बाथ एसेसरीज बिजनेस कर रहा था। इसमें करीब 30 लाख का नुकसान हो गया। हालत जीने-मरने की आ गई।

दरअसल, मेरे प्रोडक्ट पैन इंडिया जाते थे। जिन-जिन क्लाइंट्स को मैंने प्रोडक्ट सप्लाई किए थे, उनमें से अधिकांश ने पेमेंट नहीं किया। कुछ की मौत हो गई, तो किसी ने फोन-कॉल को रिसीव करना ही बंद कर दिया। इन लोगों के यहां आने-जाने में मेरे कितने लाख रुपए खर्च हो गए।

एक रोज हम दोनों ऐसे ही बैठे थे। सोच रहा था कि घर चलाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। क्या करूं, जिससे जिंदगी पटरी पर आ जाए। अचानक मशरूम की फार्मिंग के बारे में सूझा, क्योंकि उस वक्त बहुत सारे लोग ये काम कर रहे थे।

एक नया ट्रेंड शुरू हुआ था, न्यूज में भी देखता-सुनता था। लेकिन मेरे साथ सबसे बड़ा चैलेंज था कि गुजरात में मशरूम कौन खरीदेगा, खाएगा, क्योंकि यहां तो सब इसे नॉन वेज मानते हैं। तब पत्नी ने सलाह दिया कि क्यों न इससे प्रोडक्ट बनाकर बेचा जाए।'

भवेश का एक बेटे है, जो अभी स्कूल से लौटा है। वो गेट पर हमारी बातचीत को सुन रहा है। भवेश कहते हैं, 'मैंने तो 10वीं तक ही पढ़ाई की है। ये इस बार 11th में गया है। मेरे हाथ तो बचपन से ही फैक्ट्री में झुलसने लगे थे।

लोहे की फैक्ट्री में 6 साल काम करने के बाद लगा कि कब तक ये सब करता रहूंगा। बड़े भाइयों की मदद से पहले दीवार पर पेंट करने में इस्तेमाल होने वाले पाउडर बनाने की एक छोटी-सी फैक्ट्री शुरू की। फिर 2016 में बाथ एसेसरीज का काम...। दरअसल, राजकोट मैन्युफैक्चरिंग का हब माना जाता है। इससे मुझे काम सीखने में मदद मिली।

जब मशरूम के बिजनस के बारे में सोचना शुरू किया, तो सबसे बड़ी चिंता यही थी कि इसके बारे में न तो मुझे कुछ पता है और न पत्नी को। मशरूम की कई कैटेगरी होती है। इसके लिए अलग-अलग एनवायर्नमेंट भी चाहिए। गुजरात में गर्मी अधिक पड़ती है, तो यहां इसकी फार्मिंग कैसे की जा सकती है, इसका भी डर था।

मैंने छानबीन शुरू की, तो 'मशरूम गर्ल' के नाम से मशहूर उत्तराखंड की दिव्या रावत के बारे में पता चला। देहरादून जाकर करीब 15 दिनों की ट्रेनिंग ली। हालांकि इसके बाद मुझे कई राज्यों में भी जाकर मशरूम से प्रोडक्ट बनाने के बारे में सीखना पड़ा। कुछ दिन कोलकाता और फिर कुछ दिन पुणे के मशरूम इंस्टीट्यूट में जाकर मशरूम उगाने और इससे प्रोडक्ट बनाने के पूरे प्रोसेस को सीखा।’

अब भवेश मुझे शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर अपने गांव लूथिया लेकर चलते हैं, जहां उन्होंने मशरूम का प्लांट लगा रखा है। इस दौरान वो मशरूम की क्वालिटी, कैटेगरी, बिजनेस स्ट्रेटजी, प्रोडक्ट, मैन्युफैक्चरिंग... इन सारी चीजों के बारे में बताना शुरू करते हैं।

भवेश ने 50×200 स्क्वायर फीट में मशरूम का प्लांट लगा रखा है। शेड के भीतर छोटी-छोटी पोटली में भूसा को बांध कर रस्सी के सहारे लटकाया गया है। भवेश कहते हैं कि अभी कुछ दिन पहले ही मशरूम की कटाई हुई है। ये जो गठरी आप देख रहे हैं, इसे मशरूम बेड कहते हैं। मैं ऑयस्टर मशरूम की फार्मिंग करता हूं। दरअसल, इसकी फार्मिंग करना दूसरी कैटेगरी के मुकाबले आसान होता है।

भवेश कहते हैं, ‘पहले से आर्थिक स्थिति तो खराब ही थी। एक डेढ़ साल तक इधर-उधर हाथ-पैर मारता रहा। कई लोगों के सामने हाथ फैलाएं, लेकिन कौन पैसा देता...। पहले से जो भी जमा-पूंजी थी, सब ट्रेनिंग, रिसर्च, मार्केट स्टडी… इन्हीं सारी चीजों में खत्म हो गया।

अंत में जब थक-हार गया, तो मैंने पत्नी के गहने गिरवी रखकर इस बिजनेस की शुरुआत की। गहने गिरवी रखने से मिले करीब 10 लाख रुपए को मशरूम बिजनेस में इन्वेस्ट किया। यदि पत्नी न होती, तो शायद ये सब न होता। हो सकता था कि मैं कोई गलत कदम उठा लेता।'

भवेश बताते हैं कि इंडिया में खास तौर से 5 तरह के मशरूम की फार्मिंग की जाती है। यह अलग-अलग टेंपरेचर के मुताबिक होता है। मशरूम और इससे बने प्रोडक्ट की इंडिया के अलावा ग्लोबली बहुत ज्यादा डिमांड है। आयुर्वेद और हेल्थ सेक्टर में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।

मशरूम पाउडर से बने प्रोडक्ट को आपने बेचना कैसे शुरू किया?

भवेश बताते हैं, ‘गुजरात के लोग मशरूम को नॉनवेज समझते हैं। मुझे याद है, 'जब मैंने मशरूम पाउडर से खाखरा, भाखरी जैसे गुजराती डिशेज बनाकर मार्केट में बेचने के लिए जाता, तो लोग बोलते- मशरूम क्या होता है? इसे या इससे बने प्रोडक्ट को कौन खरीदेगा?

मेरी पत्नी को जॉइन्ट पेन की बहुत दिनों से प्रॉब्लम थी। मशरूम पाउडर को जब वो पानी या दूध में घोल कर करीब 6 महीने तक पीना शुरू किया, तो उसे काफी आराम मिला। तब हमें पता चला कि टेस्ट के साथ-साथ हेल्थ के लिए भी ये फायदेमंद है।

मुझे अपने प्रोडक्ट के बारे में लोगों को बताना था। सबसे पहले मैंने रिश्तेदारों को फ्री में बांटना शुरू किया, क्योंकि लोग पैसे से नहीं खरीदना चाहते थे। जब लोगों को इसके फायदे के बारे में पता चला, तब वो खरीदने लगे। फिर मैंने वेबसाइट, सोशल मीडिया के जरिए इसे प्रमोट करना शुरू किया।'

भवेश कहते हैं कि जब उन्होंने ऑनलाइन मशरूम से बने प्रोडक्ट को बेचना शुरू किया, तो शुरुआत में कई बार ऐसा हुआ कि महीने-पंद्रह दिन एक भी ऑर्डर नहीं आते थे। वो कहते हैं, 'घर चलाना मुश्किल हो चला था।

शहर में रहकर परिवार चलाना कितना कठिन है इस मंहगाई के दौर में... आपको भी पता ही होगा। धीरे-धीरे जब मैंने डिजिटली प्रोडक्ट को प्रमोट करना शुरू किया, तो ऑर्डर बढ़ने लगे। आज हर महीने 200 से ज्यादा ऑर्डर आते हैं।'

वो कहते हैं, 'ऑयस्टर मशरूम को सुखाकर पाउडर तैयार किया जाता है। इससे हम प्रोडक्ट तैयार करते हैं। करीब 8 महीने में ही मैंने मशरूम पाउडर से बने प्रोडक्ट्स बेचकर 12 लाख का कारोबार कर लिया है। अभी मैं और पत्नी मिलकर ही बिजनेस को संभाल रहे हैं, लेकिन अब टीम बनाने की सोच रहा हूं।

मशरूम पाउडर से प्रोडक्ट बनाने के साथ-साथ हम कच्चे मशरूम को भी मार्केट डिमांड के मुताबिक बेचते हैं। इससे भी अब तक करीब 15 लाख का कारोबार हो चुका है।’

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