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स्मित को है बचपन से ही न्यूरोलॉजी संबंधी बीमारी लेकिन बाधाओं को तोड़ कर स्मित ने 12वीं में पहला रैंक हासिल किया था, UPSC क्रैक करना चाहते हैं, नाक से चलाते हैं मोबाईल

‘मेरा जन्म सामान्य बच्चों की तरह ही हुआ। तीन महीने का था तब पेरेंट्स को पता चला कि मुझे न्यूरोलॉजी संबंधी बीमारी है। हाथ-पैर बैलेंस नहीं हो रहे। पहले पैर ने काम करना बंद कर दिया, तो मैं व्हीलचेयर पर आ गया... फिर हाथ ने।

मम्मी बताती है कि जब मैं छोटा था और वो मेरी बॉडी की मालिश करती थीं, तो मेरे हाथ-पैर टेढ़े नजर आते थे। सीधे नहीं हो पाते थे। उन्होंने गुजरात से लेकर मुंबई तक… अनगिनत डॉक्टरों से दिखवाया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। मैं दूसरे बच्चों की तरह चल-फिर, खेल-कूद नहीं सकता था।

मां-बाप की पहली संतान हूं। मेरी परवरिश ठीक ढंग से हो, इसलिए मम्मी-पापा ने दूसरा बच्चा प्लान नहीं किया। मैं भले ही दिव्यांग हूं, लेकिन मैं खुद को सामान्य बच्चा ही मानता हूं। नाक और होंठ से मोबाइल चलाता हूं, लोग देखकर दंग रह जाते हैं। सरकारी नौकरी के दो-तीन ऑफर भी आ चुके हैं, लेकिन मुझे UPSC क्रैक करना है, इसी की तैयारी में जुटा हूं। ’

दोपहर के दो बज रहे हैं, चिलचिलाती धूप पड़ रही है। गुजरात के राजकोट के रहने वाले स्मित चांगेला अभी कॉलेज से लौटे हैं। बेड पर दो-तीन तकियों के ऊपर मोबाइल रखा है, जिसे अपनी नाक और होंठ से चला रहे हैं। यहीं पर मेरी उनसे बातचीत हो रही है। स्मित बताते हैं, 'पहले मैं हाथ से ही मोबाइल चलाता था, चैट करता था, लेकिन जब हाथ ने काम करना बंद कर दिया, तो टाइप करने पर कंधे में दर्द होने लगा।'

 स्मित चांगेला हैं, जो नाक से मोबाइल चला रहे हैं।

स्मित जब अपने दोनों हाथों को ऊपर-नीचे करने की कोशिश करते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे इनमें जान ही नहीं है। वो कहते हैं, 'हाथ में प्रॉब्लम होने की वजह से बहुत ज्यादा तकलीफ होती थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। एक दिन ऐसे ही बैठा था। सोचा नाक से टाइप करके देखूं। कोई सामान्य व्यक्ति अपनी आंखों को यदि किसी स्क्रीन के नजदीक लेकर जाता है, तो उसे वो धुंधला दिखाई देता है, आपको भी देता होगा, लेकिन मैंने जब ऐसा किया, तो मुझे सारी चीजें दिखाई दे रही थीं।

मैंने नाक से ही टाइप करना शुरू कर दिया। जब मेरे दोस्तों ने देखा, तो वो शॉक्ड रह गए। मैं नाक से टाइप करके उनसे भी फास्ट और सटीक लिखता हूं। होंठ से मोबाइल के स्क्रीन को स्क्रॉल करता हूं। सामने वाले को इसका अंदाजा भी नहीं होता होगा कि मैं नॉर्मल तरीके से टाइप नहीं कर रहा हूं।’

लैपटॉप भी चलाते हैं?- मेरे इस सवाल पर स्मित के पास ही बैठी उनकी मम्मी लैपटॉप खोलकर देती हैं और स्मित की-बोर्ड को नाक से टाइप करने लगते हैं। वो कहते हैं, ‘मैं इंडिया का पहला ऐसा व्यक्ति हूं, जो मोबाइल और लैपटॉप को नाक से चलाता हूं। अब मैं इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराना चाहता हूं।’

मां अनिलाबेन चांगेला हैं, जो स्मित की हर एक्टिविटी में मदद करती हैं।

स्मित कहते हैं, ‘पिछले साल मैंने 12वीं स्टेट बोर्ड के एग्जाम में सामान्य बच्चों में तीसरा और फिजिकली चैलेंज्ड बच्चों में पहला रैंक हासिल किया था।’

स्मित बातचीत के दौरान कई बार दोहराते हैं, "घरवालों ने कभी मुझे ‘विकलांग’ होने का एहसास नहीं होने दिया।"

आपने दूसरा बच्चा प्लान नहीं किया…?

वो कहती हैं, ‘जब डॉक्टर ने कहा कि स्मित को न्यूरो की बीमारी है, आगे चलकर हाथ-पैर काम नहीं करेंगे। तब हमने सोचा कि यदि दूसरा बच्चा प्लान करूंगी, तो फिर इसकी ठीक ढंग से परवरिश नहीं हो पाएगी। जैसा बाकी दिव्यांग बच्चों के साथ होता है, इसके साथ भी वही होगा।

बचपन से ही यह पढ़ने में इंटेलिजेंट था। जब हम लोग इसके इलाज के लिए इधर-उधर भटक रहे थे, तो डॉक्टर के यहां देखते थे कि ज्यादातर न्यूरो पेशेंट्स की दिमागी हालत भी ठीक नहीं रहती थी। इस मामले में हम भाग्यशाली हैं। स्मित के सिर्फ हाथ-पैर में प्रॉब्लम थी। वो बैलेंस नहीं कर पा रहा था।'

स्मित की मां हिंदी समझती हैं, लेकिन बोल नहीं पाती हैं। वे गुजराती ही बोलती हैं। उनकी बातों को स्मित और स्मित के पापा मुझे हिंदी में ट्रांसलेट करके बता रहे हैं।

स्मित के पापा कहते हैं, 'मैं 12वीं और पत्नी 10वीं तक ही पढ़ी है, लेकिन स्मित के हालात देख हमें पता था कि यदि हम दूसरे बच्चे को लेकर प्लान करते हैं, तो इस पर पूरा फोकस नहीं हो पाएगा।

घरवालों ने भी कभी इस बात को लेकर हम दोनों पर दबाव नहीं बनाया कि हम दूसरा बच्चा प्लान करें। यदि हमने उस वक्त ये फैसला नहीं लिया होता, तो स्मित जैसा आज है, वैसा नहीं बन पाता। आज हम लोग स्मित की वजह से जाने जाते हैं। सोसाइटी के लोग कहते हैं कि ये स्मित के मम्मी-पापा हैं।’

स्मित के पापा कहते हैं कि हमें इस बात को एक्सेप्ट करना ही था कि स्मित कभी ठीक नहीं हो सकता है, लेकिन यह कभी न सोचा था कि वो अपने स्किल्स और पढ़ाई की बदौलत करियर बना सकता है, दूसरों के लिए प्रेरणादायी बन सकता है।

स्मित की मां कहती हैं, 'यह हर बार अपने क्लास में टॉप करता है। कई बार इसने अलग-अलग तरह की एक्स्ट्रा एक्टिविटी में भी हिस्सा लिया है, और जीता है। इसका स्टडी टेबल और अलमारी अवॉर्ड और अचीवमेंट सर्टिफिकेट से भरे हुए हैं ।’

स्मित कहते हैं, ‘मैं छोटा था, तब एक-दो बार ऐसा हुआ कि आस-पास के लोग, छोटे बच्चे मुझे चिढ़ाते थे। मेरी लाचारी का मजाक उड़ाते थे, लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, ये सारी चीजें मेरी काबिलियत की बदौलत खत्म होती चली गईं। घर में कभी मेरे साथ सौतेला व्यवहार नहीं हुआ। आज मेरे दोस्त मेरे साथ बैठकर सेल्फ स्टडी करते हैं, मैं उन्हें गाइड करता हूं, एग्जाम की प्रिपरेशन के लिए हेल्प करता हूं।'

स्मित की बातों के बीच उनके पापा बोल पड़ते हैं, ‘आप स्मित की उपलब्धि और टैलेंट का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि स्मित को एग्जाम में अपने साथ राइटर रखने की परमिशन होती है, जो कॉपी लिखता है और स्मित बोलता है।

वो अपने सब्जेक्ट्स को याद करता है, उसे दिमाग में कैप्चर करता है। वो राइटर को जैसा बताता है, राइटर उस तरह से उसे लिखता है। हम लोग उस वक्त दंग रह गए, जब स्टेट बोर्ड के एग्जाम में इकोनॉमिक्स और स्टैटिक्स में इसे 100 में से 100 नंबर आए। थ्योरी को तो याद करके लिखा जा सकता है, लेकिन प्रैक्टिकल में ग्राफिक्स, चार्ट, टैली… इन सारी चीजों को राइटर के जरिए कॉपी पर फ्रेम करना मुश्किल होता है, जो मेरे बेटे ने कर दिखाया।’

स्मित बताते हैं, ‘पहले मम्मी मुझे स्कूल छोड़ने जाती थीं, लेकिन अब मेरे दोस्त मुझे घर से स्कूल लेकर जाते हैं, घर ड्रॉप करने के लिए आते हैं। मैं खुद को हमेशा मोटिवेट रखता हूं। दोस्तों के साथ हर वीकेंड पर घूमने, मौज-मस्ती करने के लिए जाता हूं। भले ही मैं व्हीलचेयर के सहारे चलता हूं, लेकिन कभी अपने विल पावर को कम नहीं होने देता हूं।

हम अपनी सोसाइटी में ये भी देखते हैं कि बेटी के पैदा होने पर भी लोग दूसरे बच्चे की राह देखते हैं, बेटे के पैदा होने का इंतजार करते रहते हैं, लेकिन मेरे दिव्यांग होने के बावजूद भी मम्मी-पापा ने कभी ऐसा नहीं सोचा।'

स्मित से बातचीत करने पर ऐसा नहीं लग रहा है कि उनकी उम्र महज 18 साल है। वो किसी अनुभवी व्यक्ति की तरह बात कर रहे हैं। वो कहते हैं, मेरे पास हर रोज दर्जनों कॉल आते हैं। 12वीं में टॉप करने के बाद जब मेरे कुछ इंटरव्यू छपे, तब कई राज्यों से कॉल आने शुरू हो गए।

जब इन दिव्यांग बच्चों की पीड़ा को मैंने सुना, तो हैरान रह गया। सोच में पड़ गया कि इनके साथ किस तरह का व्यवहार होता है। वो कहते थे कि उन्हें जानवर की तरह समझा जाता है। 25 साल की उम्र होने के बावजूद भी वो कुछ नहीं कर पा रहे। जिसके बाद मैंने इन लोगों को मोटिवेट करना शुरू किया।’

स्मित बताते हैं, 'कुछ दिन पहले की ही बात है। एक लड़की अपने परिवार के साथ मेरे यहां आई थी। उसके कमर के नीचे का हिस्सा काम नहीं कर रहा था। वो बहुत ज्यादा डीमोटिवेटेड थी। बता रही थी कि उसे सभी चिढ़ाते रहते हैं, मैंने उसे मोटिवेट किया कि लोगों का काम है कहना… वो अपनी स्टडीज पर फोकस करे और करियर बनाए।'

स्मित की मां कहती हैं, ‘मुझे याद है कि स्मित का एक एग्जाम था और सेंटर थर्ड फ्लोर पर था। बिल्डिंग में लिफ्ट नहीं थी। एडमिन ने कहा कि हम थोड़ा इंतजार कर लें, लेकिन मैं बिना किसी इंतजार के स्मित को गोद में लेकर थर्ड फ्लोर पर चली गई।’

स्मित खुद को एक एंटरप्रेन्योर भी कहते हैं। वो बताते हैं, 'कोरोना के दौरान मैं ऐसे ही बैठा हुआ था। सोचता था कि कोई बिजनेस करूं, तभी मैंने ट्रेडिंग स्टार्ट किया था। थोक में प्रोडक्ट खरीदकर उसे ऑनलाइन बेचता था। करीब 8-9 महीने में ही मैंने दो-ढाई लाख रुपए का रेवेन्यू जेनरेट कर लिया।

फिर मैंने स्टॉक मार्केट में भी इन्वेस्ट करना शुरू किया। ये सारी चीजें मैं ऑनलाइन देखकर सीखता हूं। हालांकि अभी मैंने अपने बिजनेस को होल्ड कर दिया है, ताकि स्टडी पर फोकस कर सकूं। अब मेरा टारगेट UPSC है। मैं सोसाइटी को बताना चाहता हूं कि हौसले हाथ-पैरों के मोहताज नहीं होते।'

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