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बालोद जिले के कई गांवों में नहीं जलती है होलिका क्योकि होलिका जलाने से गांव में आग के गोले बरसने लगते हैं

बालोद/ मंगलवार को देशभर में शुभ मुहूर्त पर होलिका जलाई गई, लेकिन बालोद जिले के कई ऐसे गांव हैं, जहां अलग-अलग कारणों से होलिका नहीं जलाई जाती है। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से है। कई जगह सोमवार की देर रात होलिका जलाई गई।

बालोद जिले के कई गांवों में नहीं जलती है होलिका

बालोद. मंगलवार को देशभर में शुभ मुहूर्त पर होलिका जलाई गई, लेकिन बालोद जिले के कई ऐसे गांव हैं, जहां अलग-अलग कारणों से होलिका नहीं जलाई जाती है। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से है। कई जगह सोमवार की देर रात होलिका जलाई गई। कहीं दैवीय प्रकोप, तो कहीं होलिका जलाने से गांव में आग के गोले बरसने की घटना, कहीं अन्य कारणों से होलिका नहीं जलाते हैं।

होली की आग से नंगे पांव निकलते हैं

डौंडीलोहारा विकासखंड मुख्यालय से चार किमी दूर जाटादाह गांव की खास परंपरा है। इस गांव में परंपरा कई सालों से चली आ रही है। यहां होलिका दहन पर विशेष मुहूर्त निकाला जाता है और गांव के लोग होली की आग से नंगे पांव निकलते हैं। आज तक इस परंपरा में कोई भी हताहत नहीं हुआ है।

नंगे पांव चलने से मनोकामना होती है पूरी

मान्यता है कि होलिका दहन के बाद अंगारों पर नंगे पांव चलने से मनोकामना पूर्ण होती है। किसी आपदा या बीमारी से गांव को बचाने के लिए परंपरा को निभाते हैं। सालों पुरानी परंपरा में बुजुर्ग से लेकर बच्चे भी होलिका की आग पर नंगे पांव ऐसे चलते हैं, मानो जमीन पर चल रहे हों। ऐसा करने में न किसी के पैरों में छाले पड़ते हैं और न ही आज तक कोई हताहत हुआ है। यह अनोखी परंपरा कब से है ग्रामीण भी नहीं जानते।

पहले लगती थी आग, तब से नहीं जलाते होलिका

गुरुर विकासखंड के सोंहपुर में 152 साल से होलिका दहन नहीं हुआ। ग्रामीणों ने बताया कि होलिका दहन करने पर गांव में आग के गोले बरसने लगते थे। किसी न किसी के घर में आगजनी की घटना होती थी। ऐसे में बुजुर्गों ने होलिका दहन नहीं करने का फैसला किया। 60 वर्षीय पटेल तुकाराम सोरी ने बताया कि आगजनी से पूरा गांव परेशान था। ज्योतिषाचार्य ने गांव में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित कर पूजा-अर्चना करने कहा। ग्रामीणों का दावा है यहां आज भी जमीन के अंदर घरों के जलने के अवशेष मिलते हैं। लोग होली के दिन सूखी होली मनाते हैं।

हैजा के कारण नहीं जलाते होलिका

गुंडरदेही ब्लॉक के ग्राम चंदनबिरही में 9 दशकों से होलिका नहीं जली। गर्मी के दिनों में गांव में हैजा प्रकोप होता था, बच्चे मर रहे थे। यह बात 1925 से पहले की है। ग्रामीण महिलाओं को गर्भ के समय गांव से बाहर भेजने लगे, लेकिन जब महिलाएं वापस आती थीं तो फिर से बच्चे मरने लग जाते थे। तब चंदनबिरही के जमींदार निहाल सिंह, जो गुंडरदेही का राजा थे, उन्होंने गांव में होली खेलना और जलाना बंद करा दिया, तब से ना होलिका जली और ना होली खेली गई।

झलमला में नहीं जलाते होलिका

जिला मुख्यालय से 3 किमी दूर ग्राम झलमला गंगा मैय्या स्थल के कारण क्षेत्र में प्रसिद्ध है, लेकिन यहां होलिका नहीं जलाई जाती है। दूसरे दिन रंग और गुलाल से होली खेली जाती है। ग्रामीण पालक ठाकुर का कहना है कि परंपरा 112 वर्षों से भी ज्यादा समय से चली आ रही है। उनके बुजुर्ग ने उन्हें बताया कि होलिका दहन करने से गांव में कुछ बुरा हो जाएगा।

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