आदिवासी रीति-रिवाज, परंपरा से कराते हैं महुआ पेड़ की शादी, तेल हल्दी चढ़ाई, शहनाई भी बजाई गई; मान्यता है की महुए के फूल ज्यादा खिलेंगे
दंतेवाड़ा/ वैसे तो छ्त्तीसगढ़ का बस्तर आदिवासी संस्कृति, परंपराओं के लिए पूरे विश्व में विख्यात है। यहां अच्छी बारिश के लिए मेंढक-मेंढकी की शादी, भीमसेन पत्थर को हिलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन, क्या आप जानते हैं...ग्रामीण अपने प्रमुख वनोपज महुआ फूल की अच्छी पैदावार के लिए महुआ के पेड़ों की शादी भी करवाते हैं। ये सुनने में थोड़ा अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन यकीन मानिए ऐसा होता है और इसमें ग्रामीणों की बड़ी आस्था जुड़ी है।
दंतेवाड़ा जिले के पौराणिक नगरी बारसूर में देवगुड़ी स्थल के पास ग्रामीणों ने महुआ पेड़ की शादी की अनूठी परंपरा निभाई है। इलाके के सिरहा, गुनिया, बैगा समेत ग्राम प्रमुखों के साथ ग्रामीण इकट्ठा हुए। जिन्होंने आदिवासी रीति-रिवाज अनुसार महुआ पेड़ का विवाह संपन्न करवाया। ग्रामीणों ने बताया कि, जिस तरह से आदिवासी संस्कृति में दूल्हा-दुल्हन को तेल हल्दी चढ़ाई जाती है, ठीक इसी तरह से महुआ पेड़ के तनों में भी तेल-हल्दी चढ़ाई गई।
पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर ग्रामीण थिरके। शहनाई भी बजाई गई। ग्रामीण खुद घराती और बराती बने। आदिवासी रीति-रिवाज के अनुसार विवाह संपन्न किया गया। विवाह होने के बाद ग्रामीण महुआ पेड़ की परिक्रमा लगाकर जमकर थिरके। साथ ही कई तरह के पारंपरिक गीत भी गाए गए। ग्रामीणों ने बताया कि, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। महुआ फूल की अच्छी पैदावार हो इसलिए महुआ पेड़ की शादी करवाई गई है।
ग्राम पटेल बोले - हमारी आस्था है
बारसूर ग्राम पटेल झोड़ूराम प्रधान ने बताया कि, आदिवासी संस्कृति में जिस तरह से दूल्हा-दुल्हन को तेल-हल्दी लगाया जाता है, ठीक उसी प्रकार महुआ पेड़ की टहनियों में तेल-हल्दी लगाकर शादी करवाई जाती है। इस शादी में गाजे-बाजे और शहनाई बजाकर पुरुष महुआ पेड़ का चक्कर लगाते हुए नाचते हैं। गांव में जश्न का माहौल होता है। तेल-हल्दी खेलने की रस्म पूरी करते हैं। सारी रस्मों को पूरा करने के बाद ग्राम देवी-देवताओं को भोग लगाया जाता है। साथ ही माता दंतेश्वरी के दर्शन कर महुआ की अच्छी पैदावार हो इसलिए कामना करते हैं।
महुआ फूल है प्रमुख आय का स्त्रोत
दरअसल, बस्तर के ग्रामीण यहां के वनोपज पर ही निर्भर हैं। महुआ, टोरा, आम, ईमली, समेत कई वनोपज उनकी आय का प्रमुख साधन है। इनमें महुआ का सबसे ज्यादा महत्व है। ग्रामीण शादी समारोह से लेकर शोक कार्यक्रमों में भी महुआ से बनी शारब का उपयोग करते हैं। साथ ही बाजारों में महुआ फूल बेचकर अपनी अच्छी आमदनी करते हैं। अब छत्तीसगढ़ सरकार भी ग्रामीणों से महुआ फूल खरीदकर उससे कुकीज समेत अन्य खाद्य सामग्री भी बना रही है।
यह भी अनोखी परंपरा
बस्तर संभाग सहित दंतेवाड़ा जिले में इस अच्छी बारिश के लिए किसान आस्था का सहारा लेते हैं। दंतेवाड़ा जिले में उदेला की पहाड़ी पर स्थित भीमसेन पत्थर को हिलाया जाता है। इंद्रदेव को मनाने के लिए ग्रामीण इस परंपरा को अपनाते हैं। उदेला की पहाड़ी पर स्थित भीमसेन के पत्थर को हिलाने के लिए लगभग 100 गांव के पुजारी और सैकड़ों ग्रामीण पहुंचते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि जब भी जिले में बारिश नहीं होती है तो वे पूरे विधि-विधान से भीमसेन की पूजा-अर्चना करते हैं। यह परंपरा पिछले कई सालों से चलती आ रही है।


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