एक बिस्किट के लिए 3 घंटे ईंट ढोने वाला संतोष पटेल जब बना DSP, माँ-बाप ने परेड में देखा तो कहा 'ऐ गरीबी -देख तेरा गुरूर टूट गया....
'नदी के किनारे फूस के घर में पैदा हुआ। गरीबी इतनी कि घर में खाने के दाने नहीं होते। कोई गेस्ट आता, तो इस ताक में रहता कि आज कुछ अच्छा खाना खाने को मिलेगा। जैसे-तैसे मम्मी-पापा ने हम तीन भाई-बहनों को पाला। खुद का झोपड़ी था, लेकिन पापा दूसरों की बिल्डिंग बनाते थे। वो राजमिस्त्री थे। मां को खेतों में काम करने के लिए जाना पड़ता था।
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| संतोष पटेल DSP |
खाने के पैसे नहीं थे, तो किताबें खरीदने के लिए पैसे कहां से होते? पापा किसी तरह किताब-कॉपी खरीदने के लिए पैसे अरेंज कर पाते। मैं पुरानी किताबें खरीदकर पढ़ता। फटे-पुराने कपड़े पहनकर स्कूल जाता। बरसात के दिनों में बाहर से ज्यादा घर के अंदर पानी बरसता। किताबें भीग जाती थीं।
DSP बनने के 5 साल बाद पुलिस की वर्दी में पहली बार जब अपने गांव मां से मिलने गया, तो उनके खुशी के आंसू रुक नहीं रहे थे। उस वक्त भी मां खेत में काम कर रही थीं। उनकी नजरें बार-बार मेरे कंधे पर लगे स्टार्स को निहार रही थीं।'
पहले वीडियो में पटेल अपनी मां से मिलने खेत में पहुंच जाते हैं, जबकि दूसरे वीडियो में वो एक बुजुर्ग महिला को लिफ्ट देते नजर आते हैं। इसी दौरान महिला ने भाड़े के रूप में उन्हें 20 रुपए देना चाहा।
संतोष जब शुरुआती दिनों के बारे में बताते हैं, तो वो कई बार कहते हैं- ‘संघर्ष और मां-बाप के त्याग की बदौलत ही मैं यहां तक पहुंचा हूं।’
वो कहते हैं, 'सरकार ने दादा जी को पट्टे में जमीनें दी थीं। पेट पालने के लिए मम्मी-पापा दूसरों के खेतों में मजदूरी करने के लिए जाते थे। जहां हम लोग रहते थे, वो इलाका जंगल के बीच था। बगल से नदी बहती थी। इतनी भी खेती नहीं हो पाती थी कि हम लोगों के खाने के लिए अनाज भी पैदा हो पाए। बाद में पापा दूसरों की जमीन बंटाई पर लेकर खेती करने लगे, लेकिन सिर्फ खेती करके घर चलाना मुश्किल था।’
वो कहते हैं, ‘मैं बहुत छोटा था। 8-10 साल की उम्र रही होगी। किसी तरह से गुजर-बसर करने के लिए कुछ पैसे मिल जाएं, इसलिए बरसात के दिनों में हम लोग वन विभाग में पेड़ लगाने का काम करते थे। तेंदू का पत्ता चुनते थे। इसी से बीडी बनाई जाती है। पापा शहद भी निकालते थे। '
संतोष कहते हैं, 'बाद में पापा ईंट ढोने, दीवार बनाने का काम करने लगे। आज भी याद है कि मैं भी उनके साथ कुछ दिन काम करने के लिए गया था। धूप में पसीने से पूरा शरीर तरबतर हो जाता। सोचता था कि अनपढ़ होने की वजह से पापा को दो पैसे के लिए इतनी मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है। पापा को कुआं बनाते हुए देख बहुत डर लगता था। भरी दोपहरी में पापा ईंट की जोड़ाई करते थे।
मुझे कुछ खाने-पीने का मन होता, तो एक बिस्किट या मिठाई के लालच में मैं लोगों के यहां तीन-तीन घंटे ईंट ढोता। पूरे हाथ छिल जाते थे। कई बार ऐसा होता कि मैं पढ़ना नहीं चाहता, तो मां हंसिया थमाते हुए कहती- खेत में काम करने चलो। मैं जाता और दो-चार घंटे काम करने के बाद ही थक जाता। तब मां कहती- नहीं पढ़ोगे, तो पापा की तरह यही सब करना पड़ेगा।’
तस्वीर में मां को देखते हुए संतोष कहते हैं, ‘तब मुझे लगा कि पढ़ना ही सबसे आसान है, लेकिन जिस तरह के हालात थे। कभी-कभी पढ़ना भी बहुत बड़ा बोझ लगता था। सरकारी स्कूल में पढ़ने जाता था। किताब-कॉपी, पेंसिल की बहुत दिक्कत थी। मैं पुरानी किताबें खरीदकर पढ़ता।'
संतोष ने 8वीं तक की पढ़ाई गांव से की। उसके बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए पन्ना आ गए। संतोष बताते हैं, 'अपने गांव के ही एक जानने वाले के रूम में रहता था। इसमें कोई सुविधा नहीं थी। दीवार पर प्लास्टर भी नहीं हो रखा था। कई किलोमीटर दूर से पीने का पानी ढोकर लाना पड़ता। बाहर चबूतरे पर नहाता। शौच के लिए भी करीब दो किलोमीटर दूर नदी किनारे जाना पड़ता। इसी दौरान मैं संस्कृत के श्लोक याद करता।
परिवार की आर्थिक स्थिति देख अधिकतर टीचर मुझसे पैसे नहीं मांगते थे। मेरे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि रूम का किराया दे पाऊं। मुझे याद है कि एक बार मैं एक दोस्त के यहां मकान मालिक से छुपकर रहने लगा। उस रूम में 2 लोग पहले से रहते थे। बिना परमिशन के मैं तीसरा रहने लगा। एक रोज मकान मालिक को शक हो गया। उसने डांट-फटकार कर रूम से भगा दिया।’
संतोष कहते हैं, 'मुझे घर के हालात देख डर होता था कि यदि कहीं ढंग की नौकरी नहीं लगी, तो पापा की तरह मुझे भी दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ेगी। 12वीं के बाद मेरा एडमिशन सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया। यहां फीस नहीं लगती थी, छात्रवृति के पैसे से किताब-कॉपी खरीदता था।
इंग्लिश न आने की वजह से बहुत दिक्कत भी होती थी। कई किलोमीटर पैदल चलकर कॉलेज जाता। सभी बच्चे अच्छे कपड़े पहनकर आते। मैं फटा-पुराना पहनकर जाता था। कई बार ऐसा भी हुआ कि किसी पार्टी में दूसरे बच्चे अलग-अलग तरह के नए कपड़े पहनकर आते। मैं कॉलेज ड्रेस में ही चला जाता।'
वो कहते हैं, '2012-13 की बात है। पैसों की जरूरत को पूरा करने के लिए मैं नेटवर्क मार्केटिंग से जुड़ गया। इस वजह से पढ़ाई से पूरा ध्यान हट गया। जैसे-तैसे B.Tech तो कर लिया, लेकिन घरवालों से झूठ बोलकर M.Tech में एडमिशन ले लिया, ताकि मार्केटिंग से कुछ पैसे कमा पाऊं।
एक रोज पापा ने पैसा भेजने से मना कर दिया। उन्होंने कहा- अब नौकरी-चाकरी करो। मैं पैसा नहीं भेज पाऊंगा। बाद में वो मुझे लेकर गांव चले गए। करीब सालभर मेरी पढ़ाई छूटी रही। पापा का कहना था कि या तो मैं किसी चीज की तैयारी करूं, नहीं तो गांव में ही रहकर गाय-भैंस चराऊं। गांव के लोगों का ये भी कहना था कि बेटे को इतना पढ़ाकर क्या कलेक्टर बनाओगे। काम करेगा, तो कुछ पैसे भी मिलेंगे।
मैंने ठान लिया कि अब जब तक लाल बत्ती नहीं ले लूंगा, दाढ़ी नहीं बनाऊंगा। महज 15 महीने में ही मैंने फॉरेस्ट गार्ड का एग्जाम क्रैक कर लिया, लेकिन इसमें इतने पैसे नहीं मिल रहे थे कि घर की स्थिति ठीक हो पाए। इतना कर्ज और गरीबी थी कि संभाल पाना मुश्किल था।'
संतोष साल 2000 का एक वाकया बताते हैं। कहते हैं, ‘गंभीर बीमारी की वजह से मेरे मरने-जीने जैसे हालात हो गए थे। घरवाले कई दिनों तक झाड़-फूंक में लगे रहे। दरअसल, फेफड़े में पानी भर गया था।
ऑपरेशन में 50 हजार से ज्यादा का खर्च हो गया। जिस परिवार में दो जून की रोटी के लिए मशक्कत करनी पड़ रही हो। वहां 50 हजार रुपए… पापा को कर्ज लेना पड़ा था। कई बार उन्हें मैंने लोगों के सामने कर्ज के लिए गिड़गिड़ाते भी देखा है। कर्ज का बोझ इतना था कि 10 हजार रुपए के लिए 25 हजार इंटरेस्ट देना पड़ रहा था। जब बहन की शादी हुई, तो उसमें और अधिक कर्ज हो गया। 2015 तक पापा को पूरा कर्ज चुकाना पड़ा।’
सिविल सर्विसेज में कैसे सिलेक्शन होता है?
वो बताते हैं, ‘फॉरेस्ट गार्ड में नौकरी के दौरान ही मैंने पब्लिक सर्विस कमीशन (PCS) की तैयारी शुरू कर दी। कोई कोचिंग नहीं ली, सेल्फ स्टडी करने लगा। पहली बार जब एग्जाम दिया, तो 4 नंबर से मेंस रह गया। दूसरी बार में एग्जाम क्लियर हो गया। 2018 MPPCS बैच में मेरा सिलेक्शन DSP के रूप में हो गया।
मुझे याद है जब मां-पापा भोपाल परेड आए थे, तो उनके शब्द यही थे- 'ऐ गरीबी -देख तेरा गुरूर टूट गया, तेरा मुंह काला हो गया, तू मेरी दहलीज पर बैठी रही मेरा बेटा पुलिसवाला हो गया।'
2021 में संतोष की शादी हुई है। इस दौरान भी संतोष का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो अपनी पत्नी को साइकिल पर बैठाकर ले जा रहे थे।
संतोष कहते हैं, ‘जिस इलाके में मेरा घर है, वहां उस वक्त सड़क नहीं हुआ करती थी। गाड़ी जा नहीं सकती थी। इसलिए मैं अपने चाचा से साइकिल लेकर रोशनी को बैठाकर ले गया। मैं DSP बन चुका था, लेकिन जिस संस्कार और परंपरा की बदौलत यहां तक पहुंचा, उसे भूल नहीं सकता था। रोशनी को मम्मी-पापा ने बहुत पहले ही पसंद किया था।’
संतोष कहते हैं कि जब वो कॉलेज में पढ़ते थे, तो कोई उनसे बात नहीं करना चाहता था। आज वही लोग उन्हें कॉल करके उनके कामों की तारीफ करते हैं। संतोष अपने इलाके में बतौर पुलिस अधिकारी सहज और सरल स्वभाव के लिए जाने जाते हैं।
संतोष कहते हैं, ‘मैं नहीं चाहता हूं कि पुलिस और वर्दी से कोई डरे। इसलिए मैं आम लोगों के बीच जाता हूं और उन्हें ये एहसास दिलाने की कोशिश करता हूं कि मैं भी उन्हीं के बीच का हूं।'

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