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बैगाओं की अनोखी होली- 13 दिन तक मनाते हैं होली, दूसरे के गांव में अचानक ही पहुंच जाते हैं और मुखौटा पहन करते हैं खेखड़ा नृत्य

कवर्धा/ तरी नानार नानी, तरी नानार नानी, तर नार नानी, खेल रे गजबेल खेलन हम रे..। उत्साह और उमंग से भरा ये पारंपरिक गीत पंडरिया ब्लॉक के वनांचल इलाके में बैगाओं की होली को अनोखा बनाती है। दरअसल, यहां के बैगा समुदाय के लोग तेरस यानी 13 दिन तक होली मनाते हैं। इस दौरान बैगा युवक-युवतियों का नर्तक दल एक से दूसरे के गांव में अचानक ही पहुंच जाते हैं और खेखड़ा नृत्य कहते हैं।

नृत्य के दौरान नर्तक दल का प्रमुख (पुरुष व महिला) चेहरे पर मुखौटा पहने रहते हैं। पुरुष मुखौटे को खेखड़ा और महिला के मुखौटे को गिजजी कहते हैं, जो सेमर लकड़ी को आकृति देकर बनाते हैं। वहीं 3 खाट को जोड़कर हाथी की आकृति बनाई जाती है, जिस पर पुरुष दल का प्रमुख बैठता है। टोली के बाकी सदस्य मांदर व अन्य वाद्य यंत्र बजाते हुए नृत्य करते हैं।


घेरे वाला घाघरा व पगड़ी पहनते हैं पुरुष नर्तक

फागुन नृत्य बिना श्रृंगार के नहीं होता। शृंगार करके ही बैगा युवक-युवतियां खेखड़ा नृत्य करते हैं। जिसने शृंगार नहीं किया, उसे नृत्य में शामिल नहीं किया जाता। महिला व पुरुषों का अपना-अपना श्रृंगार होता है। पुरुष घेरदार घाघरा पहनते हैं। साथ ही कमीज सलूखा और काली जाकेट। सिर पर पगड़ी और उसमें मोर पंख की कलगी, गले में विभिन्न रंगों की मालाएं पहनते हैं। सभी के हाथों में ठिसकी (वाद्य यंत्र) रहता है। बैगा महिलाएं श्रृंगार प्रिय होतीं हैं और नृत्य के लिए अधिक सज-संवरकर पहुंचती हैं। मुंगी धोती धारण करती हैं। जूड़े में मोर पंख की कलगी पहनतीं हैं।

वनांचल गांवों में रहने वाले बैगा समाज के लाेग हर्बल होली खेलना पसंद करते हैं। इलाके के जंगलों से पलाश (टेसू) के फूल तोड़कर धूप में सुखाते हैं और फिर उसे पीसकर गुलाल बनाते हैं। महीनेभर पहले ही तैयारी शुरू हो जाती है। इसी रंग से होली खेलते हैं। बैगा समाज के लोग 13 दिन यानि तेरस तक रंग उत्सव मनाते हैं।

ऐसी परंपरा: हर त्योहार के लिए अलग-अलग नृत्य व गीत

बैगा समाज के जिला प्रमुख इतवारी मछिया बताते हैं कि जनजातियों में हर त्योहार के लिए अलग-अलग नृत्य व गीत है। खेखड़ा नृत्य भी उन्हीं में से एक है, जो फागुन में किया जाता है। इन दिनों पंडरिया अंचल के ग्राम तेलियापानी लेदरा, तेलियापानी धोबे, बाकी, केशमर्दा, रुख्मीददर समेत अन्य बैगा बाहुल गांवों में यह नृत्य देखने को मिलेगा।

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