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बालवाड़ी संचालन की तैयारी शुरू हुई नहीं की प्रिंट रिच वातावरण (दीवार लेखन) के नाम पर लीपापोती का खेल शुरू हो चुका है; एक कमरे में प्रिंट रिच का खर्चा १५ हजार होने की बात नहीं हो रही हजम


जांजगीर चंपा/ बालवाड़ी का संचालन अभी ठीक से पटरी पर नहीं आ पाया है। संचालन के लिए अलग से भवन की कोई व्यवस्था नहीं है। प्रायमरी स्कूलों के ही एक कमरे में बालवाड़ी का संचालन जैसे-तैसे हो रहा है लेकिन बालवाड़ी के नाम पर फर्नीचर, झूला और खेल सामानों की सप्लाई कर दी गई है जिसे रखने तक जगह नहीं है फर्नीचर को जैसे-तैसे कर कमरे में रखा गया है लेकिन झूला और खेल सामान धूल खाते पड़े हैं। क्योंकि प्रायमरी स्कूल में पहले से ही बच्चों की दर्ज संख्या के हिसाब से कमरे कम है और उनमें से एक कमरे को बालवाड़ी बना दिया गया है।

ऐसे में जिन फर्नीचर और सामानों के जरिए आंगनबाड़ी में आने वाले बच्चे को पढऩा-लिखना सिखाया जाना है वहां प्रायमरी स्कूल के बच्चे बैठ रहे हैं और आंगनबाड़ी के बच्चों का अता-पता नहीं है। गिनती के एक-दो बच्चे भी अगर बालवाड़ी में पहुंच जा रहे हैं तो बड़ी बात है। इधर फर्नीचर सप्लाई को लेकर जिला स्तर पर अधिकारियों का कहना है कि सारी सप्लाई राजधानी स्तर से हुई है। उन्हें सामाग्री आने के बाद पता चला कि बालवाड़ी के लिए फर्नीचर आ रहा है। गौरतलब है कि खेल-खेल के माध्यम से आंगनबाड़ी में दर्ज पांच से छह साल उम्र के बच्चों को प्ले स्कूल की तर्ज पर शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से बालवाड़ी योजना शुरु की गई है। इसके तहत अविभाजित जांजगीर-चांपा जिले में २५४ बालवाड़ी का संचालन किया जा रहा है।

प्रिंट रिच कराने के नाम पर चल रहा खेल....

बालवाड़ी में प्रिंट रिच वातावरण (दीवार लेखन) के नाम पर लीपापोती का खेल चल रहा है। प्रिंट रिच कराने के लिए प्रति बालवाड़ी १५ हजार रुपए प्रधानपाठकों को जारी हुआ है। २५४ स्कूलों के लिए ३८ लाख १० हजार रुपए जारी हुए हैं। इस राशि से नियमानुसार संबंधित स्कूलों के प्रधानपाठकों को प्रिंट रिच कराना है लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसके लिए जिला स्तर और ब्लॉक स्तर पर बैठे शिक्षा विभाग के अफसरों के द्वारा प्रधानपाठकों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे जिन पेंटरों को भेजेंगे उनसे ही प्रिंट रिच कराना है और १५ हजार रुपए संबंधित व्यक्ति के नाम से भुगतान करना होगा। बकायदा इसके लिए प्रधानपाठकों पर यह दवाब है कि सभी स्कूलों में प्रिंट रिच एकरुपता होनी चाहिए लेकिन प्रधानपाठकों को किसी तरह केटलॉग या फोटाग्राफ्स नहीं दिए गए हैं कि किस तरह प्रिंट रिच कराना है। इधर स्कूलों में जो व्यक्ति प्रिंट रिच करने आ रहे हैं उनके पास सारा कुछ है किस तरह प्रिंट रिच करना है। जाहिर है कि जिला स्तर पर बैठे अफसरों के द्वारा ही एक ही फर्म व्यक्ति को काम देकर उन्हें यह उपलब्ध कराया गया है।

महज एक कमरे में प्रिंट रिच का खर्चा १५ हजार...

इधर महज एक कमरे में प्रिंट रिच के लिए १५ हजार रुपए खर्च होने की बात भी हजम नहीं हो रही है। क्योंकि १५ हजार में एक कमरा तक पूरा पेंट नहीं किया जा रहा है। ऊपर सीलिंग और दीवार में भी एक से दो फीट छोड़कर प्रिंट रिच किया जा रहा है जिसमें बालवाड़ी की दीवारे तो चकाचक हो जा रही है लेकिन सीलिंग वैसे ही उखड़ रहा है तो दीवारों के छूटे हुए हिस्से भी बदरंग नजर आ रहे हैं। ऐसे में समझ जा रहा है कि महज एक कमरे के चार दीवारे भी नहीं रंग पा रही और १५ हजार रुपए का भुगतान किया जा रहा है। इधर कई स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं जहां अन्य कमरे बदरंग है इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा।

जिले में २५४ बालवाड़ी का संचालन किया जा रहा है। फर्नीचर, झूला व अन्य सामानों की सप्लाई सीधे राजधानी स्तर से हुई है। प्रिंट रिच वातावरण के लिए प्रधानपाठकों के खाते में १५ हजार रुपए की राशि जारी हुई है। प्रिंट रिच का काम प्रधानपाठक अपनी स्वेच्छा से जिस व्यक्ति से चाहे करा सकते हैं, हां एकरुपता होनी चाहिए। प्रिंट रिच कराने दबाव बनाने के संबंध में कोई जानकारी नहीं है न ही कोई शिकायत मिली है।

आरके तिवारी, डीएमसी जांजगीर-चांपा

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