भेजीपदर (देवभोग) में होता है ऐसा मड़ई मेला, 84 गांव के लोगों के साथ गांव के देवता भी शामिल होते हैं लेकिन इस बार बाजे की कमी के चलते 43 गांव के देवता ही पहुंचे
रायपुर/ छत्तीसगढ़ में मेले-मड़ई का अपना इतिहास रहा है। इसी बहाने लोग अपने नाते-रिश्तेदारों के यहां आते-जाते भी हैं। हम आपको एक ऐसी मड़ई के बारे में बताने जा रहे हैं जिसका बड़ा महत्त्व है। रायपुर से लगभग 200 किमी दूर भेजीपदर (देवभोग) में ऐसी मड़ई होती है जिसमें 84 गांव के लोग एकत्र होते हैं। इतना ही नहीं इतने ही गांव के देवता भी शामिल होते हैं। हालांकि इस बार 43 गांव के देवता शामिल हुए। इसके पीछे वजह बताई गई बाजे की कमी। हर देवता के साथ गाजा-बाजा रहता है। मान्यता है कि देवता किसी ग्रामीण पर सवार रहते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि यह मड़ई हर पांच साल में होती है। इसलिए पूरे अंचल के लोगों को इसका इंतजार रहता है। सुबह से ही दूर-दराज से लोग भेजीपदर पहुंचते हैं। अंचल का यह सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। कोई दिवाली में भले घर न लौटे लेकिन इस दिन वह जरूर आता है। क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी कार्यक्रम का हिस्सा होते हैं। इस बार उडिय़ा नाटक की प्रस्तुति दी गई।
गांव की महिलाएं भोज में नहीं आती
यह भव्य आयोजन भेजीपदर के ग्रामीण आपस में चंदा कर करते हैं। खास बात यह कि सामूहिक भोज में अंचल के सभी गांव के लोग शामिल होते हैं लेकिन भेजीपदर की महिलाएं शामिल नहीं होती।

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