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पशुओं के नखरे तौबा-तौबा - बच्चों की तरह पशु खाने पिने में करने लगे हैं नखरे, दुलार के बाद फिर दूध देती हैं गाय, जूठी तगारी में नहीं पीती पानी, गर्मी में चाहिए कूलर, चारे में च्वाइस

 जयपुर. घर में बच्चों के नखरे तो हर कोई सह लेता है मगर दुधारू पशु नखरे करें तो सीधे दूध पर संकट आता है। ठंड में इन दिनों दुधारू पशु भी नखरे करते दिख रहे हैं। अगर उनके मन माफिक चारा-पानी या देखभाल न हो तो दूध देने में आनाकानी पक्की समझो। गांवों में पशुपालन कर रहे तमाम परिवारों की इन दिनों यही शिकायत रहती है। वे बताते हैं कि कई मवेशी इतने नखरीले होते हैं कि सब कुछ उनके मन मुताबिक होना जरूरी है वरना चारा-पानी तक से तौबा कर लेते हैं। कई पशु ठंडा पानी मुंह में लगते ही आंखे दिखाते हैं मगर जब गुनगुना पानी रख दो तो मजे से पी जाते हैं।

 दुलार के बाद फिर दूध

टोंक जिले के मालपुरा उपखंड के चबराना गांव निवासी बद्रीलाल गुर्जर के यहां एक भैंस को दुहने से पहले करीब दस से पंद्रह मिनट तक दुलारना पड़ता है। इसके बाद वह दूध देती है। उनकी पत्नी माना देवी ने बताया कि दूध देते समय भी परिवार का एक सदस्य उसे दुलारता है और दूसरा दुहने का काम करता है। बद्रीलाल का कहना है कि इसके चलते कई बार रिश्तेदारी में जाना भी दूभर हो जाता है।

जूठी तगारी में नहीं पीती पानी

टोंक के लावा गांव निवासी उद्दा डीलर ने बताया कि उन्होंने हाल ही में टोंक से महंगे मोल में एक भैंस खरीदी है, उसके नखरे अजीब है। वह भैंस दूसरे मवेशियों का जूठा पानी नहीं पीती। अगर उसकी बाल्टी में किसी दूसरे मवेशी ने पानी पी लिया तो भैंस पूरे दिन प्यासी रह जाएगी मगर मजाल कि पानी पी ले। वहीं दूध भी उनकी पत्नी को ही देती है। उनको नजदीक भी नहीं फटकने देती।

गर्मी में चाहिए कूलर

जयपुर के जगतपुरा निवासी उर्मिला देवी के मवेशियों को गर्मी में विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं। उनके परिवार के लोगों के लिए कमरों में दो कूलर लगे हैं, लेकिन मवेशियों के बाड़े में तीन कूलर लगा रखे हैं। कई मवेशी रोज नहलाने पर ही दूध देते हैं।

एक ही आदमी को दूध दुहने की अनुमति

चावंडिया गांव के किसान देवाराम गुर्जर की एक गाय ऐसी है कि वह बस उसकी देखभाल करने वाले को ही दूध दुहने देती है। अगर वे कहीं बाहर चले गए तो किसी की मजाल कि दूध दुह ले।

चारे में च्वाइस

पशुपालकों की मानें तो अधिकतर मवेशी इतने सरल स्वभाव के होते हैं कि उन्हें जो भी चारा मिले खा लेते हैं लेकिन कुछ बेहद चूजी होते हैं। यदि उन्हें मन मुताबिक चारा, बांट, हरा चारा या आटे भुरका नहीं मिलता तो वे ठाण में मुंह तक नहीं घुमाते।

बदल रहा पशुओं का मिजाज

- मवेशी भी इंसानों की तरह अलग स्वभाव के होते हैं। कोई सूखा भूसा खाता है तो कोई बिना हरे चारे के मुंह तक नहीं लगाता। ऐसे मवेशी अक्सर दूध देते समय अधिक परेशान करते हैं। जगह बदलने पर मवेशियों में अधिक बदलाव देखा जाता है।

डॉ. नरेश निठारवाल, पशु चिकित्साधिकारी, सिरसी

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