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माओ के खौफ में जीने वाली लेखिका का डर-जिनपिंग लाएंगे ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ जैसी पॉलिसी; जिसमे खुद को खाने लगे थे लोग

नई दिल्ली/ चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग कभी गौरैया, चूहों, मक्खी-मच्छर और कभी खटमल को मारने के अभियान के लिए जाने जाते हैं तो कभी घर के अहाते में लोहा पिघलाने का। उनकी इन्हीं नीतियों के कारण चीन को अकाल का सामना भी करना पड़ा। माओ के कार्यकाल में करीब 5 करोड़ करोड़ लोग भूख से मारे गए। हालात ऐसे थे कि लोगों ने एक-दूसरे को ही खाना शुरू कर दिया।

हांगकांग में रह रहीं 93 साल की लेखिका युआन-त्सुंग चेन माओ के उस खौफनाक दौर की गवाह हैं। वो आज भी किताबें लिख कर लोगों को आगाह कर रही हैं। उनका कहना है कि लोग उस दौर को पढ़ें और याद रखें ताकि चीन में फिर कोई तानाशाह पैदा न हो। चेन ने अपने हालिया इंटरव्यू में कहा है कि उनके पास दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि चीन फिर से उस रास्ते पर लौट सकता है। उन्हें कोरोना और लॉकडाउन की कड़ी नीतियां लागू कर रहे जिनपिंग में माओ के दौर की झलक मिलती है।

क्या था माओ का ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ प्लान

साल 1949 में माओ ‘पीपल रिपब्लिक ऑफ चाइना’ (PRC) पार्टी का गठन कर सत्ता में आए। सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद माओ की पार्टी ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ प्लान लेकर आई। यह पांच साल तक चलने वाली आर्थिक और सामाजिक अभियान की नीति थी। इसका लक्ष्य कम्युनिस्ट इकोनॉमी आइडियोलॉजी का उपयोग करके देश के कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण करना था। औद्योगीकरण के साथ इसमें जमीन का निजी स्वामित्व खत्म करके सामूहिक खेती की नीति अपनाई गई। साथ ही ‘मारो चार’ अभियान चलाया। इस अभियान में गौरैया, मक्खी, मच्छर और चूहे जैसे चार जीवों को मारना था। उनका मानना था कि देश का काफी अनाज गौरैया खा जाती हैं। उनकी उस नीति के कारण साल भर के अंदर चीन से गौरैया लगभग खत्म हो गईं। गौरैया की खात्मे से खेतों में कीड़े-मकौड़ों की तादाद बढ़ी और वो सारा अनाज चट कर गए। उस साल चीन के इतिहास में सबसे बड़ा अकाल आया। इन सब की वजह से चीन की इकोनॉमी चरमरा गई और देश भुखमरी की कगार पर पहुंचा गया। कुल मिलाकर प्लान बुरी तरह से फ्लॉप हुआ। चीन इतिहासकार यू जिगुआंग की रिसर्च के अनुसार 5 करोड़ 60 लाख लोगों को जान गंवानी पड़ी थी।

जब भुखमरी के कारण लोग खुद को खाने पर हुए मजबूर

चेन इस प्लान के कारण हुई हताशा और भुखमरी के बारे में बताती हैं कि उन्होंने एक इंसान की कहानी सुनी जो भूख की वजह से खुद को खाने लगा। पहले तो उन्हें उस बात पर यकीन नहीं हुआ। वो कहती हैं- ‘पहले तो मैंने सोचा कि यह एक अफवाह है’। लेकिन इस दौरान एक गांव में रहते हुए मेरी सोच बदल गई। माओ ने चीन को विनाशकारी स्थिति में ला दिया था। मैंने देखा कि वास्तव में भूख की चरम पर लोग ऐसा कर सकते हैं।' यह अतिशयोक्ति नहीं थी, यह असल जिंदगी की कड़वी सच्चाई थी। लेकिन इसे कोई स्वीकार नहीं करेगा।

चेन चाहती हैं लोग याद रखें माओ का खौफनाक दौर

चेन कहती हैं उनके पास दुनिया के लिए एक चेतावनी है। चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग का जिक्र करते हुए वो कहती हैं- 'जब आप माओ की राह पर काम करते हैं, तो मुझे डर लगता है।' मैं इस वजह से लिखती हूं ताकि लोगों को चीन के उस भयावह दौरा का पता चले। भविष्य में देश उस खौफनाक राह पर कभी न चले। साथ ही, लोग माओ जैसे नेता के समर्थन से पहले सौ बार सोचें।

अमीर परिवार में पलीं, कृषि क्रांति की कैडर बनी थीं

युआन-त्सुंग चेन का जन्म 1932 में चीन के शंघाई में हुआ। चेन का पालन-पोषण एक अमीर घराने में हुआ। उन्होंने मिशनरी स्कूल से पढ़ाई की। वो चोंगकिंग में रहती थी। लेकिन चीन-जापान युद्ध के बाद शंघाई लौट आई। साल 1949 में जब चीन की सत्ता कम्युनिस्टों के हाथ आई, तब वो वहीं रहीं। 1950 में जब चेन 18 साल की हुईं तो उन्हें उनकी पहली जॉब बीजिंग के सेंट्रल फिल्म ब्यूरो में मिली। लेकिन नौकरी ज्यादा दिन चल नहीं पाई क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी ने शहर में सबकुछ बंद कर युवाओं को 'कृषि क्रांति' में शामिल होने के लिए शहर से गांव भेजना शुरू किया। चेन भी क्रांति में शामिल होने के लिए बीजिंग छोड़ गांसु प्रांत चली गईं। वह एक युवा क्रांतिकारी बनीं। उन्हें कैडर के रूप में जाना जाता था। 1958 में उन्होंने एक कम्युनिस्ट पत्रकार जैक चेन से शादी की, जो एक प्रमुख चीनी-ट्रिनिडाडियन परिवार से आते थे। झोउ एनलाई जैसे शीर्ष पार्टी अधिकारियों के साथ उनके संबंध थे।

माओ के डर से अपने लिखे को लगानी पड़ी आग

क्रांति में शामिल होने से पहले साल 1955 में चेन सेंट्रल फिल्म ब्यूरो में ही थी जब प्रसिद्ध चीनी मार्क्सवादी लेखक हू फेंग को एक रिपोर्ट लिखने के लिए हिरासत में लिया गया था। फिर अचानक से माओ ने पार्टी की आलोचना का स्वागत करना शुरू कर दिया। 'सौ फूल खिलने दो' नारे का इस्तेमाल कर वो लोगों से पार्टी की कमियों की आलोचना करने के लिए आग्रह करते। सारी बातों से प्रभावित चेन ने लिखना शुरू किया। लेकिन इससे पहले कि वो उसे खत्म करती, माओ ने 'फ्रेंग्रेट फ्लावर्स' की जगह 'जहरीले खरपतवार' पैदा करने का आरोप लगाने वाले आलोचकों को जमा करना शुरू किया। आलोचकों को या तो मौत की सजा दी जाती या लेबर कैंप भेज दिया जाता। इस डर से चेन ने अपने पहले ड्राफ्ट को आग के हवाले कर दिया था।

कैडर के दौरान के एक्सपीरियंस को दी किताब की शक्ल

उस दौरान चेन ने भूमि सुधार पर काम किया और माओ की असफल औद्योगिक और कृषि पहल के दौरान भुखमरी जैसी कठिन परिस्थिति का सामना किया। इस दौरान जितना संभव हो सका उन्होंने उतना लिखा और पढ़ा। लेकिन फिर ‘कल्चरल रेवोल्यूशन’ के नाम पर लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को सताया जाने लगा। साल 1972 में चेन अपने पति जैक चेन और बेटे के साथ अमेरिका चली गईं और वहां एक स्कूल में पढ़ाने लगीं। चेन ने बतौर कैडर अपने उस एक्सपीरियंस को कहानी के रूप में पब्लिश करने का फैसला किया। 1980 में चेन की पहली किताब 'द ड्रैगन्स विलेज' प्रकाशित हुई थी। यह एक फिक्शनल बुक थी, जिसमें 1960 के ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ के दौरान एक गांव में रहने के उनके अनुभवों पर आधारित है।

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