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बरसते बमों के बीच यूक्रेन में 30 किमी अंदर जाकर फंसे हुए छात्रों को पोलैंड ले कर आए MP के युवा उद्योगपति अमित लाठ

इंदौर/ रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआती दौर में बमबारी के बीच यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को बचाने के लिए एक प्रवासी भारतीय ने अपनी जान की परवाह तक नहीं की। मध्यप्रदेश के बुरहानपुर से निकला यह युवा उद्योगपति उनके लिए रॉबिनहुड बनकर पहुंचा। इनका नाम है अमित लाठ, जिनका प्रवासी भारतीय सम्मेलन में 10 जनवरी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सम्मान करने वाली हैं।

सम्मान की बड़ी वजह भी यही है कि पोलैंड में रहते हुए उस मुश्किल दौर में वे भारत सरकार के लिए शांति दूत बनकर सामने आए थे। यूक्रेन में 30 किमी अंदर जाकर फंसे हुए छात्रों को बस में बैठाकर पोलैंड ले आए। यूं तो अमित का जन्म मुंबई में हुआ है, लेकिन उनका परिवार बुरहानपुर में रहता था। यहां उनकी टेक्सटाइल इंडस्ट्री है। लाठ का टेक्सटाइल कारोबार राजस्थान में भी है यहीं उनका कॉर्पोरेट ऑफिस है।

 लाठ ने बताया- मुश्किल दौर में अपने लोगों के काम आना गर्व की बात होती है। मैंने जो किया वो मेरी ड्यूटी थी। पोलैंड में रहते हुए यूक्रेन में अपने देश के बच्चों को ऐसे मुश्किल में फंसे देखा तो उनके लिए जो बन पड़ा, वो सब कुछ किया।

ये भारत सरकार का इनिशिएटिव था। अच्छी लीडरशिप जब रहती है तो हिम्मत बढ़ जाती है। पोलैंड के इंडियन डायस्पोरा को पता था कि भारत सरकार का लक्ष्य है कि यूक्रेन में फंसे बच्चों को हर हाल में सुरक्षित बाहर निकालना है। उस समय जनरल वीके सिंह को ऑपरेशन गंगा के लिए पोलैंड भेजा गया था।

जनरल सिंह और भारत की राजदूत नगमा मलिक ने जबरदस्त फोकस के साथ इस ऑपरेशन के लिए एक टीम बनाई। उस टीम में मुझे भी शामिल किया। जिंदगी के वो दो हफ्ते मेरे लिए बहुत अहम पल थे। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा समय देखने को मिलेगा और हमारे छात्र इतनी दुविधा में फंसे होंगे, लेकिन पोलैंड आने के बाद उनका जो इंतजाम किया गया था, वो बहुत खास था।

डॉक्टर और एम्बुलेंस सब तैनात थे। इंडियन एयरफोर्स के प्लेन जब हमारे छात्रों को लेने पोलैंड आए तो पूरे यूरोप के लोग हतप्रभ थे कि भारत सरकार अपने लोगों की कितनी चिंता करती है। वे अचंभित थे कि इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए बिना कोई पैसा लिए इतनी सुविधाएं जुटाईं और उन्हें सुरक्षित निकालकर देश ले गए।

बॉर्डर तक पैदल आने में छात्रों को 4 दिन लग रहे थे

इस मिशन में इंडो-पोलिश चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (IPCCI) ने रणनीति बनाने में मदद की। इस मिशन के तहत युद्धग्रस्त यूक्रेन के अंदर से 30 से 50 किलोमीटर पैदल चलकर आ रहे भारतीय छात्रों को पोलैंड के सुरक्षित क्षेत्र में पहुंचाना था। पैदल आने में इन्हें 4 दिन का समय लग रहा था। इस दौरान यूक्रेनियन पुलिस की ज्यादती का खतरा बना हुआ था। इस पर ठंड के दौरान रास्ते में ही रात बिताने से तबीयत भी बिगड़ने लगी थी।

बुरहानपुर से पोलैंड तक की यात्रा कैसी रही?

बुरहानपुर से मेरा बचपन से ही जुड़ाव रहा है। बुरहानपुर में हमारा परिवार 1960 से है। हमारी इंडस्ट्री भी यहां है। मैं मुंबई में पढ़ता था, लेकिन छुटि्टयों में बुरहानपुर आता था। बुरहानपुर में मेरे ताऊ, चाचा और भाई जब मुझसे कहते थे कि ऑफिस आ जा बेटा। मैं ऑफिस जाता था, मुझे तब नहीं पता था कि मैं बिजनेस की लर्निंग कर रहा हूं।

मध्यप्रदेश के पानी में और मिट्‌टी में जो जोश और सीख मिली है, उसे मैं ग्लोबल लेवल पर अप्लाई कर रहा हूं। मेरा कॉर्पोरेट ऑफिस राजस्थान में है, लेकिन मैं बीते 25 साल से यूरोप में रह रहा हूं। बहुत ही सफलतापूर्वक हम बिजनेस रन कर रहे हैं।

बुरहानपुर से जुड़ी कुछ बातें आपको याद हैं?

बुरहानपुर तो हमेशा यादों में रहता है। यहां से बिजनेस की सीख मिली है, वहां भाइयों से मिलने जाता रहता हूं। कोविड से पहले भी बुरहानपुर गया था। अभी व्यस्तता के चलते हो सकता है न जा पाऊं, लेकिन इस साल ताऊ और चाचा से मिलने जरूर जाऊंगा। मैं नियमित रूप से उनके संपर्क में हूं।

बरसते बमों के बीच यूक्रेन में 30 किलोमीटर भीतर तक कैसे पहुंचे?

भारतीयों को लाने के लिए एम्बेसी ने यूक्रेन के अंदर घुसने का फैसला किया। लगातार बिगड़ते हालात और गोलीबारी के बीच यह काम नामुमकिन जैसा ही था। मिशन था- यूक्रेन में 30 किलोमीटर अंदर घुसना और सभी भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकालकर पोलैंड पहुंचाना।

24 फरवरी को रूस का हमला होते ही पोलैंड में इंडियन कम्युनिटी एक्टिव हो गई। IPCCI के साथ मिलकर एम्बेसी ने 7 टीमें बनाईं। इनमें से किसी को भारतीयों को यूक्रेन से निकालने का जिम्मा दिया गया, तो कोई स्टूडेंट्स के ठहरने और खाने का इंतजाम कर रही थी। एक स्पेशल कंट्रोल रूम बनाया गया। यहां से पूरे ऑपरेशन के को-ऑर्डिनेशन और एग्जीक्यूशन पर नजर रखी गई।

भारतीय छात्रों का रेस्क्यू कैसे किया?

मिशन पूरा करने के लिए बसों का काफिला यूक्रेन से आ रहे छात्रों को लाने के लिए रवाना किया गया। ये छात्र यूक्रेन के पश्चिमी छोर पर पोलैंड की तरफ आने वाले रास्तों पर थे। पश्चिमी यूक्रेन का शहर यावोरिव पोलैंड बॉर्डर से 49 किलोमीटर दूर है। इसी रास्ते से भारतीय छात्र पैदल पोलैंड की तरफ आ रहे थे। रास्ते में इन लोगों को यूक्रेन की सेना और बॉर्डर पुलिस टॉर्चर कर रही थी। ऐसे में मिशन को जल्द अंजाम देने पर भारतीय दूतावास का सबसे बड़ा फोकस था।

मध्यप्रदेश के बुरहानपुर से ही उन्होंने टेक्सटाइल बिजनेस की ट्रिक सीखी है। अब वे अपने हुनर से पूरी दुनिया में अपने बिजनेस का विस्तार कर रहे हैं। अमित इंडो-पोलिश चैम्बर ऑफ कॉमर्स (IPCCI) के वाइस प्रेसिडेंट हैं।

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