मिट्टी के जादुई स्पर्श से मन के सारे दु:ख, सारी निराशाएं मिट्टी में, तन के साथ मन को भी संबल देती है मिट्टी
मिट्टी के सम्पर्क में आते ही मन के सारे दु:ख, सारी निराशाएं मिट्टी में मिल जाती हैं। ऐसा जादुई स्पर्श है माटी का।
मिट्टी की महिमा मिटने में
मिट मिट हर बार संवरती है
मिट्टी मिट्टी पर मिटती है
मिट्टी मिट्टी को रचती है...
हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की कविता ‘मिट्टी की महिमा’ की ये पंक्तियां जीवन में मिट्टी की सार्थकता को बयां करती हैं। मिट्टी का हम सबके जीवन में विशेष महत्व है। मनुष्य बचपन में जिस मिट्टी में खेलता है एक दिन उसी मिट्टी में मिल जाता है। आदिम काल से ही फ़सल उगाने से लेकर, रहने के लिए घर बनाने और खाने-पकाने के लिए बर्तन तक में मिट्टी की भूमिका रही है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पंचतत्वों में शामिल मिट्टी मानव सभ्यता की बुनियादी ज़रूरतों में से एक है।
मिट्टी सिर्फ़ तन ही नहीं मनुष्य के अंतर्मन को भी छूती है। जब इंसान ख़ुद को अवसाद, अकेलेपन और निराशा में घिरा पाता है, तो मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को रौंदने के साथ ही वह अपने मन की व्यथा को भी रौंद देता है। ऐसा करके वह मूर्तियों या अन्य कलाकृतियों को ही आकार नहीं देता, बल्कि ख़ुद के व्यक्तित्व को भी नए सिरे से गढ़ने का काम करता है।
सुकून का सबब है मिट्टी
आयुर्वेद में मिट्टी के माध्यम से तन-मन दोनों के मर्ज़ के उपचार की पद्धति का ज़िक्र है। आयुर्वेद में मिट्टी के माध्यम से मानसिक चिकित्सा को लेकर कहा गया है कि यह हर जीव का स्वभाव है कि वह प्रकृति में सुकून पाता है। उसे उन चीज़ों से सुकून मिलता है जो प्राकृतिक होती हैं और अप्राकृतिक चीज़ों में ज़्यादा देर यह सुकून नहीं मिल पाता। हम मनुष्य भी अन्य जीवों जैसे ही हैं। हम पंच महाभूतों से बने हुए हैं और इन महाभूतों के सौम्य स्वरूप के सम्पर्क में आने पर हमें शांति प्राप्त होती है। सर्दियों में धूप में जाने में शांति मिलती है, गर्मियों में सुबह की ठंडी बयार हमें तरोताज़गी से भर देती है, कल-कल करते पानी को देखना, उसे छूना या उसमें पैर डुबोकर बैठना सुकून से लबालब कर देता है। वैसा ही आनंद मिलता है मिट्टी से जुड़ने में।
नंगे पैर बग़ीचे में चलने पर जब धरती के संपर्क में आते हैं तो हमें अच्छा महसूस होता है। जब हम मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू की अनुभूति करते हैं तो अच्छा लगता है। स्वाभाविक ही, पहली बारिश के बाद मिट्टी से आने वाली सौंधी ख़ुशबू दुनिया की सबसे अच्छी ख़ुशबुओं में से एक है। ऐसे में जब हम मिट्टी से जुड़े काम करते हैं तो उससे भी हमें आनंद प्राप्त होता है। मिट्टी को छूने वाले काम जैसे बाग़वानी या मिट्टी के बर्तन बनाना या मड स्नान हमें सुकून देते हैं।
मां जैसा माटी का स्पर्श
मनोवैज्ञानिक डॉ. नम्रता सिंह कहती हैं कि अवसाद होने पर हमारी सोचने और काम करने की क्षमता कम हो जाती है और हमारे मस्तिष्क में निराशा भरी बातें आने लगती हैं। हमारी ज्ञानेंंद्रियां सुस्त पड़ जाती हैं। इसके साथ ही शारीरिक गतिविधियां भी कम हो जाती हैं। हमारा किसी भी काम में मन नहीं लगता है। मड थैरेपी में हम कीचड़ यानी मिट्टी को ही छूते हैं, इससे हमारे स्पर्श की अनुभूति अधिक सक्रिय हो जाती है। इसका कारण यह है कि जीवन की शुरुआत में हम सबसे पहले छूकर या छुए जाकर ही संवाद और समझ अर्जित करते हैं, जैसे अपनी मां के स्पर्श को हर शिशु पहचानता है।
मां को छूने पर शिशु को अच्छा महसूस होता है। ये सारी जानकारी हमारे अवचेतन मन में सुरक्षित रहती है। इसलिए जब हम चीज़ों को छूृकर महसूस करते हैं तो हमारे अंदर आनंद का भाव उमड़ने लगता है। इससे हमारे अंदर शारीरिक और मानसिक बदलाव होने लगते हैं, साथ ही हमारी मानसिक क्षमता बढ़ जाती है। यह अवसाद को दूर करने मेें मददगार है। इसलिए पुर्नवास केंद्रों में भी इसे उपचार के लिए एक थैरेपी के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
मृदा बन गई औषधि
जम्मू-कश्मीर के लोक निर्माण विभाग में सिविल इंजीनियर के रूप में कार्यरत साइमा शफ़ी पॉटर गर्ल या ऑनलाइन कुम्हार के नाम से जानी जाती हैं। उनकी वजह से कश्मीर की आधुनिक रसोई में मिट्टी के बर्तनों की फिर से वापसी हुई है। उन्होंने यह कला बेंगलुरू के पॉटर्स ट्रेनिंग स्कूल से सीखी है। 32 साल की साइमा पॉटरी को डिप्रेशन दूर करने का सबसे अच्छा माध्यम मानती हैं। वे बताती हैं, ‘मुझे मिट्टी के बर्तन बनाने की यह कला बचपन से ही प्रभावित करती थी। लेकिन जब बड़ी हुई तो पहले पढ़ाई पूरी की फिर अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। एक तरह से जीवन में सबकुछ था, लेकिन कुछ कारणों से ऐसी निराशा और अवसाद छाया कि ख़ुद की ज़िंदगी ख़त्म करने के बारे में सोचने लगी। ऐसे में कह सकती हूं कि इस मिट्टी ने मुझे बचाया। मेरे सारे ग़म, सारा अवसाद मानो मिट्टी में मिल गए।’ वे कहती हैं कि मन को प्रफुल्लित करने वाली इस परम्परागत कला को जीवंत रखने के लिए सभी को प्रयास करने चाहिए।
इसी तरह, जनकवि नागार्जुन, रामधारी सिंह दिनकर, निराला, मुक्तिबोध की मशहूर पंक्तियों को निर्मला शर्मा ने मिट्टी की पॅाटरी पर उकेरा है। सेवानिवृत्त शिक्षिका निर्मला के इकलौते बेटे देवाशीष शर्मा ने 10 दिसम्बर 1994 को जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के विरुद्ध एक सैन्य अभियान में अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने प्राण अर्पित कर दिए थे। मूर्ति निर्माण की कला जानने वाली निर्मला अपने बेटे की यादों को जीवंत रखना चाहती थीं। ऐसे में वर्ष 2006 में पति की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए ख़ुद को मृत्तिका शिल्प से जोड़ लिया। 2007 से वे लगातार बेटे की याद में अपने बनाए मिट्टी के बर्तनों की प्रदर्शनी देश के अलग-अलग हिस्सों में लगाती हैं। इनसे प्राप्त राशि को वे भारतीय सेना की झंडा निधि को सौंप देती हैं जिसका प्रयोग शहीदों के परिवारों की आवश्यकता पूर्ति के लिए होता है।
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